बिहार चुनाव के बाद गुजरात बनने की चर्चा के बीच जोड़तोड़

प्रदेश संगठन में बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी में फेरबदल के बाद अब गुजरात पैटर्न में सत्ता के परिवर्तन के मिल रहे संकेतों से विन्ध्य के सम्भावित प्रमुख दावेदारों के बीच इन दिनों हलचलें तेज हो गई हैं. कोई संघ के प्रति अपने अनुराग और सहयोग की चर्चा कर रहा है, तो कोई मुख्यमंत्री से अपनी नजदीकियों को आए दिन सार्वजनिक करता दिखाई देता है. हालांकि अब तक भाजपा में सत्ता में हिस्सेदारी के लिए तय मापदंडों का कोई सुनियोजित खाका प्रकाश में कभी नहीं आया पर हमेशा जातीय संतुलन के साथ क्षेत्रीय परिस्थितियों का आकलन कर नेताओ को अवसर मिलता रहा है. पिछले दो विधानसभा चुनावों से विन्ध्य में जिस प्रकार से दल को सफलता मिलती आ रही है, नेताओं की लगातार जीत उनके अंदर सत्ता के प्रति महत्वकांक्षा का भाव पैदा कर रही है. कुछ दिनों से नेताओं में विद्रोही तेवर भी नजर आने लगे हैं. हालत यह है कि विन्ध्य में कई बार निर्वाचित प्रतिनिधियों ने ही अपने बर्ताव से सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है. अब देखना यह है कि अगर परिवर्तन होता है तो किस नए चेहरे को सत्ता की सीढ़ी चढऩे का मौका मिलता है.

विंध्य में खुशी की लहर

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नए अध्यक्ष रीवा के डा. रघुराज किशोर तिवारी नियुक्त किये गये है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम की घोषणा होते ही विंध्य क्षेत्र में खुशी की लहर दौड़ गई है. जिसके पीछे का बड़ा कारण यह भी है कि मध्य प्रदेश में पहली बार किसी शख्स को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. डा. तिवारी रीवा कृषि महाविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर पदस्थ है और छात्र जीवन से ही विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए है. जबकि इस दौरान उन्होने कई बड़े पदो पर भी कम किया. निश्चित तौर पर विंध्य के लिये यह बड़ी उपलब्धि का पल है. जल्द ही अध्यक्ष का कार्यभार सम्भालेगें. घोषणा के बाद लगातार बधाई का दौर जारी है. डा0 तिवारी कहते है कि हर विचारधारा का सम्मान करते है लेकिन राष्ट्रविरोधी प्रयास बर्दास्त नही. राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद मिलना निश्चित रूप से समूचे विंध्य के लिये हर्ष का विषय है.

बसपा, सपा और आप की खामोशी

विंध्य क्षेत्र में अब दो ही दल कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने दिखाई दे रहे है. बसपा, सपा और आप पूरी तरह से खामोश है. संगठनात्मक गतिविधियां भी उस तरह से नही है जैसी होनी चाहिये. कभी बसपा विंध्य में अपने पैर जमा ली थी और यहा से सांसद-विधायक बसपा के चुने गए. लेकिन कुछ वर्षो में बसपा की स्थित बेहद कमजोर हो गई और जनहित के मुद्दो को लेकर बसपा मुखर होकर विरोध भी नही कर रही. सपा की स्थित पहले भी ज्यादा बेहतर नही थी और अभी भी नही है. लेकिन चुनाव के दौरान बसपा तीसरे विकल्प के रूप में अपनी ताकत का अहसास कराती रही है. टिकट कटने से नाराज अन्य दलों के नेता बगावत कर बसपा का दामन थाम कर मैदान में तो उतरते है लेकिन परिणाम आने के बाद गायब भी हो जाते है. जबकि पार्टी संगठन को मजबूत बनाने प्रयास करना चाहिये. आप पार्टी से उम्मीद थी कि तीसरा विकल्प बनकर उभरेगी लेकिन आप पार्टी भी मजबूत संगठन विंध्य में नही खड़ा कर पाई.

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