
प्रवेश कुमार मिश्र नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत के साथ राजग की जीत और इंडिया समूह की करारी हार बिहार की राजनीति में नई इबारत लिखने को तैयार है. जीत और हार के कारण और कारक दोनों पक्षों की आंतरिक रणनीति का हिस्सा है लेकिन बावजूद इसके मतदाताओं ने जिस तरह का जनादेश दिया है उससे साफ है कि भविष्य में कोई भी दल घोषित गठबंधन के साथी को छोड़कर दूसरे दल या समूह के साथ गठजोड़ कर सरकार को उलट पलट करने का प्रयास नहीं करेगा.
राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि बिहार के मतदाताओं ने कांग्रेस व राजद नेताओं द्वारा लगाए गए वोट चोरी के आरोप को सिरे से खारिज कर विकास की बात पर केंद्रित राजग के प्रचार अभियान को सफल बनाया है. इस चुनाव में जहां एक तरफ महिला मतदाताओं की भूमिका को लेकर जबरदस्त चर्चा है वहीं दूसरी ओर इंडिया गठबंधन के अंदर अंत समय तक मौजूद रही आंतरिक रस्साकसी भी सुर्खियों में रही .
जानकार बता रहे हैं कि नीतीश सरकार ने जिस तरह से चुनाव के एन वक्त पहले मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के खातों में दस हजार रूपए की राशि डालकर उन्हें प्रोत्साहित किया उसका प्रभाव भी चुनाव पर सीधे पड़ा है.
महिला मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लेकर न सिर्फ मत प्रतिशत को बढ़ाया बल्कि कथित तौर पर राजग की राह भी आसान कर दी .
राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि दोनों प्रमुख गठबंधनों की रणनीति में आरंभिक दिनों से ही स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा था. एक तरफ अपनी डफली अपना राग अलापा जा रहा था तो दूसरी ओर सुनियोजित योजना के साथ मतदाताओं को आकर्षित करने का प्रयास किया गया. एक तरफ मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के नाम को घोषित कराने के लिए अंतिम समय तक खींचतान जारी रही तो दूसरी ओर मोदी-नीतीश की जोड़ी की बात कहकर भाजपा ने सहयोगियों के साथ मतदाताओं के सामने भी स्थिति स्पष्ट रखी . इतना ही नहीं कुछ सीटों पर फ्रेंडली फाइट का प्रयोग भी इंडिया समूह पर भारी पड़ा और मतदाता अंतर्द्वंद्व में फंसे रहे. जबकि राजग समूह ने हरेक नाराजगी को चुनाव के आरंभिक दौर में ही सुलझा कर विकास, सुशासन व विपक्ष के कथित जंगलराज को प्रचार का हिस्सा बनाया.
प्रेक्षकों की मानें तो टिकट बंटवारे को आधार बनाकर बिहार कांग्रेस में जिस तरह से विरोध हुआ उसके कारण जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में नाराजगी रही. टिकट बेचने का खुलेआम आरोप ने भी पहले से कमजोर कांग्रेस संगठन को और कमजोर किया.
जानकार मान रहे हैं कि राहुल व तेजस्वी की जोड़ी ने वोट चोर गद्दी छोड़ जैसे नारों के सहारे मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर चुनावी जंग जीतने की रणनीति बनाई थी लेकिन जनता ने इसे सिरे से खारिज कर राजद व कांग्रेस को और कमजोर कर दिया.
इस चुनाव में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी को जिस तरह से मतदाताओं ने नकार कर बिहार की राजनीति में तीसरे मोर्चे की गुंजाइश को आरंभिक दौर में ही दफन किया है उससे साफ है कि बिहार की राजनीति में नए विचारों को फलने-फूलने में अभी वक्त लगेगा.
बहरहाल, चुनाव परिणाम दोनों पक्षों के लिए संदेश है. जहां एक तरफ राजग को मतदाताओं के महत्वाकांक्षी सोच पर खरा उतरना होगा वहीं संख्या बल की ताकत में कमजोर विपक्षी दलों को आत्ममुग्धता से बाहर आकर आत्ममंथन करना पड़ेगा.
