
प्रियंका सिंह छतरपुर। जिले के लवकुशनगर में स्थित माता बंबरवैनी मंदिर बुंदेलखंड के प्रसिद्ध सिद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर 500 फीट ऊंचे विशाल पर्वत शिखर पर स्थित है। माता के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को 360 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हर साल नवरात्रि के मौके पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है।
प्रकृति और आस्था का अद्भुत संगम
लवकुशनगर के बीचों-बीच स्थित यह पर्वत और इसकी जुड़ी बावनवैनी पर्वत श्रृंखला नगर के पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। माना जाता है कि यही वजह है कि यह क्षेत्र प्राकृतिक आपदाओं से हमेशा सुरक्षित रहता है। माता बंबरवैनी का नाम एक छोटे कुंड “विवर” से जुड़ा है, जहां माता के प्रकट होने की मान्यता है। पहले इन्हें “विवरवैनी” कहा जाता था, जो समय के साथ “बंबरवैनी” नाम से प्रसिद्ध हुईं।
त्रेता युग से जुड़ी पौराणिक मान्यता
माता बंबरवैनी का इतिहास त्रेता युग से जुड़ा है। कहा जाता है कि जब भगवान श्रीराम ने माता सीता को वनवास दिया था, तब वे महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहीं। यही वह स्थान है जहां लव-कुश का जन्म हुआ। मंदिर के नीचे आज भी “माता की रसोई” गुफा के रूप में मौजूद है। पहाड़ के नीचे स्थित लव-कुश मंदिर इस कथा की गवाही देता है।
ऐतिहासिक निर्माण और धार्मिक परंपरा
इतिहासकार डॉ. काशीप्रसाद त्रिपाठी के अनुसार, 1758 से 1776 ईस्वी के बीच पन्ना नरेश हिंदूपत ने स्वप्न में दर्शन मिलने पर माता बंबरवैनी मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर के अंदर एक छोटे कुंड में श्रद्धालु दूध, फूल और बताशा अर्पित करते हैं।
