
नई दिल्ली, 01 नवंबर (डिजिटल डेस्क): बिहार के जमुई जिले की अनुसूचित जाति आरक्षित सिकंदरा विधानसभा सीट इस बार अपने जटिल राजनीतिक समीकरणों के कारण सुर्खियों में है। यहाँ एनडीए गठबंधन के उम्मीदवार के सामने महागठबंधन ने दो-दो दिग्गज उम्मीदवार खड़े कर दिए हैं, जिससे मुकाबला अप्रत्याशित रूप से त्रिकोणीय हो गया है। एनडीए की तरफ से वर्तमान विधायक प्रफुल्ल कुमार मांझी (हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा-हम) मैदान में हैं। वहीं, महागठबंधन में बड़ी फूट पड़ गई है; जहाँ कांग्रेस ने विनोद चौधरी को उतारा है, वहीं सहयोगी राजद ने भी बागी होते हुए उदय नारायण चौधरी को उम्मीदवार बना दिया है।
महागठबंधन के भीतर की यह आंतरिक फूट सीधे तौर पर एनडीए के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महागठबंधन का पारंपरिक वोट बैंक (यादव, मुस्लिम, दलित) इन दो उम्मीदवारों के बीच बँटने की आशंका है। इसके अतिरिक्त, जनसुराज पार्टी से सुभाष चंद्र बोस भी मैदान में हैं, जो मुकाबले को और जटिल बना रहे हैं। सिकंदरा का चुनावी इतिहास भी अप्रत्याशित रहा है, जहाँ अब तक हुए 15 चुनावों में राजनीतिक मिजाज तेजी से बदलता रहा है।
यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होने के कारण चुनावी नतीजों में दलित वोट, विशेषकर रविदास समुदाय के वोट, निर्णायक भूमिका निभाते हैं। राजनीतिक समीकरणों के बीच सिकंदरा क्षेत्र जैन धर्म के लिए भी प्रसिद्ध है, जहाँ भगवान महावीर की 2,600 वर्ष पुरानी मूर्ति स्थित है। हालांकि, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के बावजूद, चुनावी अखाड़े में जातिगत गोलबंदी और राजनीतिक समीकरण ही अंतिम परिणाम तय करते हैं। इस बार देखने वाली बात यह होगी कि क्या महागठबंधन की फूट का फायदा एनडीए उठा पाता है, या बागी उम्मीदवार बाजी पलट देते हैं।
