सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को वोडाफोन आइडिया के 2016-17 के एजीआर बकाया पर पुनर्विचार करने की अनुमति दी

नयी दिल्ली, 27 अक्टूबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को दूरसंचार क्षेत्र की प्रमुख कंपनी वोडाफोन आइडिया के वित्तीय वर्ष 2016-17 के लिए 5,606 करोड़ रुपये के लंबित समायोजित सकल राजस्व (एजीआर) बकाया की समीक्षा और समाधान करने की आज अनुमति दे दी।

मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ वोडाफोन आइडिया द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दूरसंचार विभाग (डीओटी) द्वारा इसी अवधि के लिए अतिरिक्त एजीआर मांग को चुनौती दी गयी थी। कंपनी ने तर्क दिया कि यह मांग उचित नहीं है, क्योंकि एजीआर देनदारियों पर उच्चतम न्यायालय के 2019 के ऐतिहासिक फैसले द्वारा बकाया राशि का भुगतान पहले ही किया जा चुका है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने न्यायालय को सूचित किया कि बदली हुई परिस्थितियों, विशेष रूप से वोडाफोन आइडिया में केंद्र द्वारा 49 प्रतिशत इक्विटी हिस्सेदारी हासिल करने और कंपनी द्वारा लगभग 20 करोड़ ग्राहकों को सेवा प्रदान करने के मद्देनजर सरकार इस मुद्दे पर पुनर्विचार करने को तैयार है।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वोडाफोन आइडिया का प्रतिनिधित्व किया। उनकी दलील को दर्ज करते हुए पीठ ने कहा, “यह देखते हुए कि केन्द्र सरकार के पास अब याचिकाकर्ता कंपनी में 49 प्रतिशत इक्विटी है और यह मुद्दा लगभग 20 करोड़ ग्राहकों के हितों से सीधे तौर पर जुड़ा है, हमें केंद्र द्वारा इस मामले पर पुनर्विचार करने और उचित निर्णय लेने में कोई बाधा नहीं दिखती।”
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसका आदेश मामले के विशिष्ट तथ्यों के आलोक में पारित किया गया था और यह विषय सरकार के नीतिगत क्षेत्राधिकार में है। पीठ ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए कहा, “हम स्पष्ट करते हैं कि यह नीतिगत मामला है। यदि व्यापक जनहित में, केन्द्र सरकार इस मुद्दे को सुलझाने का विकल्प चुनती है, तो उसे ऐसा करने से रोकने का कोई कारण नहीं है।”
इससे पहले न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने मई में वोडाफोन आइडिया और अन्य की एजीआर बकाया पर ब्याज और जुर्माने से छूट की मांग वाली इसी तरह की याचिकाओं को खारिज कर दिया था। पीठ ने कंपनियों द्वारा एक सुलझे हुए मुद्दे को फिर से खोलने के प्रयास की तीखी आलोचना की थी।
वोडाफोन आइडिया ने अपनी नवीनतम याचिका में तर्क दिया कि जुर्माने और ब्याज सहित 5,606 करोड़ रुपये की अतिरिक्त मांग को उचित नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने अपने 2019 और 2020 के आदेशों में एजीआर देनदारियों को पहले ही स्पष्ट कर दिया था। 2019 के फैसले ने दूरसंचार विभाग की एजीआर की परिभाषा को बरकरार रखा था और उसमें गैर-प्रमुख राजस्व को भी शामिल किया गया था। इससे दूरसंचार ऑपरेटरों को एक बड़ा वित्तीय झटका दिया था जिसके परिणामस्वरूप उन पर 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक का बकाया हो गया। बाद में समीक्षा और संशोधन याचिकाएँ 2020 की शुरुआत में खारिज कर दी गई थी। न्यायालय ने बाद में देनदारियों के लिए 10 साल की भुगतान अवधि का समय दिया था।

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