भारत ने पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल किया है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ताजा वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन रिपोर्ट 2025 में भारत को वन क्षेत्र में विश्व में नौवां और वार्षिक वन वृद्धि में तीसरा स्थान मिला है. यह उपलब्धि केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि देश की पर्यावरणीय सोच और कार्यनीतियों की सफलता का प्रतीक है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘ग्रीन इंडिया’ और ‘मिशन लाइफ’ जैसे कार्यक्रमों ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया है. यह समझना आवश्यक है कि विकास का मतलब केवल औद्योगिक उन्नति नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की संस्कृति भी है. भारत ने अपने जलवायु संकल्प ‘पंचामृत’ से लेकर ‘मिशन लाइफ’ तक कई पहलें शुरू कर देश और दुनिया को यह संदेश दिया है कि पर्यावरण संरक्षण राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए.
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस सफलता को केवल सरकारी प्रयास नहीं बल्कि आम जनता की सहभागिता का परिणाम बताया है. ‘एक पेड़ मां के नाम’, ‘मिशन अमृत सरोवर’, ‘नमामि गंगे’ और विभिन्न राज्यों के वृक्षारोपण अभियान पर्यावरण चेतना को मजबूत करने में मददगार साबित हुए हैं. यह हरियाली केवल स्थलीय बदलाव नहीं, बल्कि देश के आत्मसम्मान का प्रतीक बन गई है.
एफएओ की रिपोर्ट में यह भी खास बात सामने आई है कि एशिया ही एकमात्र महाद्वीप है जहां 1990 से 2025 के बीच वन क्षेत्र लगातार बढ़ा है, जिसमें चीन और भारत का योगदान सबसे अधिक है. भारत में प्रति वर्ष करीब 1.91 लाख हेक्टेयर वनवृद्धि यह दर्शाती है कि देश ने न केवल पेड़ लगाए हैं, बल्कि वन प्रबंधन के लिए वैज्ञानिक और सामाजिक उपाय भी अपनाए हैं. स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वन पंचायतों की सक्रिय भूमिका से इन प्रयासों को मजबूती मिली है.फिर भी, चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं. तेज़ गति से बढ़ता शहरीकरण और औद्योगिकीकरण पर्यावरण संरक्षण में रुकावट बन सकते हैं. इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार और समाज मिलकर ठोस कदम उठाएं. पहला, स्थानीय प्रजातियों का संरक्षण सुनिश्चित करना जरूरी है. विदेशी वृक्षों की बजाय स्थानीय और पारिस्थितिकीय रूप से उपयुक्त प्रजातियों का रोपण जैव विविधता बनाए रखने और जल संतुलन के लिए अहम होगा. दूसरा, शहरों में अर्बन फॉरेस्ट या शहरी वन क्षेत्र की स्थापना की जाए जिससे प्रदूषण और हीट आइलैंड प्रभाव कम हो. तीसरा, हर पंचायत और विद्यालय को कम से कम एक ‘ग्रीन जोन’ विकसित करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, जो पर्यावरण शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी का उदाहरण बने. चौथा, सैटेलाइट मैपिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीकों से वनों की हालत पर लगातार नजर रखी जानी चाहिए. अंत में, पानी और पेड़ के संरक्षण को एक साथ जोडक़र एक एकीकृत पर्यावरण नीति बनाई जाए.आज जब पूरी दुनिया जलवायु संकट से जूझ रही है, तब भारत की यह उपलब्धि एक प्रेरणा बनकर उभरी है. यह सिर्फ वृक्षारोपण का रिकॉर्ड नहीं, बल्कि पर्यावरणीय आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम है. प्रधानमंत्री मोदी का यह ‘ग्रीन विजन’ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए उम्मीद की किरण है. क्योंकि असली विकास तभी संभव है जब हम हर पेड़ में जीवन और हर हरियाली में विकास की छाया देखें. यही भारत का सच्चा ग्रीन संकल्प है.
