पाकिस्तान इस समय एक ऐसे बहुस्तरीय संकट से गुजर रहा है, जिसकी जड़ें उसकी सत्ता संरचना, सैन्य वर्चस्व और जातीय विभाजनों में गहराई से धंसी हुई हैं. देश राजनीतिक, आर्थिक और सुरक्षा मोर्चे पर एक साथ अस्थिरता झेल रहा है. लेकिन सबसे खतरनाक है, भीतर ही भीतर पनपता गृह-संघर्ष जो अब खुली बगावत में बदलता जा रहा है. पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान, तीनों ही क्षेत्र अपने-अपने तरीके से इस अस्थिरता की ज्वाला में जल रहे हैं. अप्रैल 2022 में इमरान खान की बेदखली के बाद पाकिस्तान की राजनीति ने जो करवट ली, उसने देश को पुन: लोकतांत्रिक रास्ते से भटका दिया. इमरान खान की गिरफ्तारी और उनकी पार्टी पीटीआई पर प्रतिबंधों ने देश के मध्यवर्ग और युवाओं में असंतोष को गहराया. सडक़ों पर प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर विद्रोह और सेना के खिलाफ खुले आरोप, ये सब पाकिस्तान में पहले कभी इतने तीव्र रूप में नहीं देखे गए थे. यह असंतोष अब केवल सत्ता परिवर्तन की मांग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सैन्य प्रतिष्ठान के वर्चस्व के खिलाफ जन-आक्रोश में बदल गया है.खैबर पख्तूनख्वा में स्थिति और भी भयावह है. अफगानिस्तान में तालिबान के पुनरुत्थान के बाद तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने अपने हमलों को कई गुना बढ़ा दिया है. पेशावर, बन्नू, मीर अली, स्वात, इन इलाकों में टीटीपी के हमले अब रोजमर्रा की बात हो गए हैं. पाकिस्तानी सेना की चौकियों पर हमले, पुलिस कर्मियों की हत्याएं, और सुरक्षा बलों पर आत्मघाती धमाके बताते हैं कि इस्लामाबाद का नियंत्रण इन इलाकों में अब नाममात्र का रह गया है. अफगानिस्तान के साथ डूरंड रेखा पर लगातार गोलीबारी और तनाव ने इस आग में घी का काम किया है.
दूसरी ओर बलूचिस्तान एक लंबे विद्रोह की तपिश झेल रहा है. दशकों से उपेक्षित बलोच जनता अपने संसाधनों पर अधिकार और राजनीतिक स्वायत्तता की मांग कर रही है. चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपेक) के तहत ग्वादर और अन्य परियोजनाओं में चीनी हितों की सुरक्षा के नाम पर पाकिस्तानी सेना ने बलोच इलाकों में कड़ी सैन्य कार्रवाई की है. परिणाम यह हुआ कि बलूच लिबरेशन आर्मी जैसे संगठन अब खुले तौर पर पाकिस्तानी सेना और चीनी ठिकानों को निशाना बना रहे हैं. हाल के महीनों में कई आत्मघाती हमलों और सैन्य ठिकानों पर हमलों ने बलूचिस्तान को लगभग अर्ध-युद्ध क्षेत्र बना दिया है.
इन सबके बीच पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था रसातल में जा चुकी है. विदेशी मुद्रा भंडार घट रहे हैं, महंगाई 30 प्रतिशत से ऊपर है, और बेरोजगारी ने लाखों युवाओं को निराशा के गर्त में धकेल दिया है. राजनीतिक अनिश्चितता और आतंकवादी गतिविधियों के कारण विदेशी निवेश ठप पड़ चुका है. आईएमएफ के कड़े शर्तों वाले ऋण ने राहत से ज्यादा बोझ बढ़ाया है.आज पाकिस्तान के भीतर जो दृश्य है, वह किसी भी विकसित राष्ट्र के लिए चेतावनी है. एक ऐसा देश जो कभी “इस्लामी एकता” के नाम पर बना था, अब जातीय विभाजनों और सैन्य तानाशाही के बोझ तले टूट रहा है. पंजाब की सत्ता-संरचना से असंतुष्ट बलोच और पख्तून अब खुलकर अलगाव की मांग कर रहे हैं.यदि यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो पाकिस्तान में राजनीतिक सत्ता और सैन्य शक्ति के बीच संघर्ष केवल एक “सत्ता संघर्ष” नहीं रहेगा, यह एक आंतरिक गृहयुद्ध में तब्दील हो सकता है. अफगान सीमा से लेकर बलूच पहाडिय़ों तक उठते धुएं और पंजाब की सडक़ों पर उतरते विरोधी जत्थे इसी आने वाले तूफान की आहट हैं.पाकिस्तान अब निर्णायक मोड़ पर है.या तो वह लोकतंत्र और संघीय संतुलन की ओर लौटेगा, या फिर अपने ही भीतर जलते विद्रोह की आग में राख हो जाएगा.
