भोजन,भजन,भाषा,भूषण और भवन सब अपना चाहिए:डॉ मोहन भागवत

सतना।राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख सरसंघचालक डॉ मोहनराव भागवत ने कहा कि अब समय आ गया है कि भारतीय समाज को अपनी जीवन पद्धति अपनानी चाहिए. इसके लिए भोजन,भजन,भाषा ,भूषण और भवन सब अपनी परंपरा और संस्कृति के अनुकूल होना चाहिए.

डॉ भागवत रविवार यहाँ सिंधी समाज के धर्म गुरु बाबा मेहर शाह के नवनिर्मित दरबार के लोकार्पण समारोह पर आयोजित जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे.कार्यक्रम में प्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल,राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी और सांसद गणेश सिंह ने भी उपस्थिति दर्ज कराई. डॉ भागवत ने भारतीय समाज मे विदेशी संस्कृति के बढ़ रहे अंधा अनुकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अब समाज मे इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिल रहे हैं. उन्होंने भारत की पुरातन संस्कृति को सर्वश्रेष्ठ निरूपित करते हुए कहा कि बाहरी संस्कृति को उतना ही अपनाया जाना चाहिए जितना आबश्यक हो.उन्होंने कहा कि स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि लोग अपनी बोली भाषा भी भूलने लगे हैं. उन्होंने तीन स्तरीय भाषा के फार्मूले की हिमायत करते हुए कहा कि हर भारतीय को न्यूनतम तीन भाषा सीखनी ही चाहिए. एक भाषा वह जो पूरे प्रान्त की भाषा हो,दूसरे वह जो क्षेत्र में बोली जाती हो और तीसरी वह जो उसकी अपनी भाषा हो.डॉ भागवत ने कहा कि अब देश बहुत से मामलों में आत्मनिर्भर हो चुका है .ऐसी स्थिति में भारतीय समाज को अपने स्व को पहचानना होगा.स्व की पहचान के साथ ही कई तरह की समस्याओं का समाधान हो जाएगा.राष्ट्र धर्म का स्व हमारे अंदर जन्मा चाहिए.इसकी शुरुआत घर के दरवाजे के अंदर से होनी चाहिए. अपने पैतालीस मिनट लंबे बौद्धिक में डॉ भागवत ने भारत को एक राष्ट्र के रूप में हिन्दू राष्ट्र बताते हुए कहा कि हम सब एक थे,हमारी संस्कृति एक थी.हमारी पहचान कही हिन्दू के रूप में थी तो कही हम हिंदवी के रूप में पहचाने जाते थे.कुटिल अग्रेजो ने हम पर शासन करने के लिए हमे एक-दूसरे से अलग कर दिया.इस अलग होने के कारणों की पहचान कर हमें एक होना है.

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