राष्ट्रधर्म को समर्पित स्वयंसेवकों की गाथा

शाजापुर: विवाह मंडप में बैठे ओमप्रकाश भावसार के सामने जीवन का सबसे कठिन निर्णय था. दूल्हा बन चुके ओमजी को हल्दी भी लग चुकी थी, लेकिन उन्होंने राष्ट्रसेवा के आह्वान पर विवाह त्याग दिया और घर से निकलकर संघ के प्रचारक बन गए. बाबूलाल सुखराम भावसार के बड़े पुत्र ओमप्रकाश ने शिक्षा, संस्कार और सामाजिक कार्यों से समाज का प्रतिनिधित्व किया, लेकिन संपूर्ण जीवन संघ कार्य को समर्पित कर दिया.

परिवारजन और समाज के वरिष्ठजन ने विवाह के लिए मनाने का प्रयास किया, यहां तक कि पिता ने उन्हें घर में नजरबंद कर दिया, परंतु अवसर पाकर वे बेरछा से भोपाल पहुंचे और वहां से प्रचारक जीवन की शुरुआत की. उनके छोटे भाई राम भावसार भी अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख और विद्यार्थी परिषद सहित विद्या भारती में सक्रिय रहे.
संघ की जड़ें ऊंचावद गांव में भी मजबूत रहीं. 1978 में शाखा की शुरुआत हुई और 1992 में वन संचार जैसे बड़े आयोजन हुए. गोपाल सिंह धनगर और ओम राठौर जैसे कार्यकर्ताओं ने गांव को संघ का गढ़ बना दिया.

आपातकाल के दौर में वरिष्ठ स्वयंसेवक रामचंद्र खाती को भाई का पता न बताने पर पुलिस ने थाने ले जाकर 18 माह 22 दिन राजगढ़ जेल में रखा. कांग्रेस नेताओं ने रिहाई के लिए संघ को सांप्रदायिक बताने का दबाव डाला, लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया. जेल में भी संघ की शाखा और मंदिर निर्माण कराते रहे. शाजापुर की धरती ने ऐसे अनेक स्वयंसेवक दिए, जिन्होंने निजी जीवन से ऊपर राष्ट्रधर्म को चुना.

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