मवई में स्वस्थ हरित क्रांति की दस्तक, युवाओं को मिल सकता है रोजगार

मंडला। मध्यप्रदेश के मंडला जिले का मवई विकासखंड प्राकृतिक संसाधनों और परंपरागत खेती से देश को नई दिशा देने की क्षमता रखता है। जंगलों से सटे इस क्षेत्र की पथरीली जमीन और सीमित वर्षा के बावजूद यहां पीढ़ियों से कोदो, कुटकी, ज्वार, मक्का और देसी सब्जियों की खेती होती आ रही है, जो अब स्वस्थ हरित क्रांति का आधार बन सकती है।

मवई के आदिवासी किसान लंबे समय से जैविक और परंपरागत खेती कर रहे हैं। यहां उगने वाला कोदो और कुटकी “शुगर फ्री चावल” के रूप में प्रसिद्ध है, जो डायबिटीज और हृदय रोग से जूझ रही आधुनिक दुनिया के लिए वरदान साबित हो रहा है। जंगल की तराई में पैदा होने वाली बरबटी, लौकी, भिंडी, कद्दू और खीरा जैसी सब्जियां स्वाद और पोषण में अद्वितीय हैं। जिले के बड़े आयोजनों और वीआईपी आगमन पर कोदो-कुटकी से बने व्यंजन परोसना यहां की परंपरा है।

लघु उद्योग इकाइयों के माध्यम से कोदो-कुटकी का आटा, पापड़, नमकीन और अन्य उत्पाद भोपाल, दिल्ली सहित बड़े शहरों तक भेजे जा रहे हैं, जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। बावजूद इसके खेती का रकबा लगातार घट रहा है। किसानों का कहना है कि सरकारी योजनाओं की कमी, समर्थन मूल्य और प्रशिक्षण का अभाव इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा है।

पड़ोसी छत्तीसगढ़ में विशेष योजनाओं और प्रसंस्करण इकाइयों के जरिये कोदो-कुटकी का उत्पादन और किसानों की आय दोनों बढ़ी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही मॉडल मवई में अपनाया जाए, तो यहां के युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार और गांवों को आत्मनिर्भरता मिल सकती है। सही पहल के साथ मवई न केवल हरित क्रांति बल्कि “स्वस्थ हरित क्रांति” का उदाहरण बन सकता है।

सरकारी उपेक्षा से घट रही परंपरागत खेती

कोदो-कुटकी, ज्वार और देसी सब्जियों जैसी परंपरागत फसलें तेजी से सिमट रही हैं। कारण हैं–सरकारी योजनाओं का अभाव, समर्थन मूल्य की कमी और आधुनिक खेती के नाम पर रासायनिक खेती को बढ़ावा। किसान कहते हैं कि केवल सम्मान निधि देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। जब तक इन फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदा नहीं जाएगा, जैविक खेती को सब्सिडी नहीं मिलेगी और किसानों को योजनाओं में शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक बदलाव संभव नहीं है।

पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ में कोदो-कुटकी के लिए विशेष योजनाएं लागू हैं। वहां सरकार न केवल इन फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीद रही है बल्कि प्रसंस्करण इकाइयों को बढ़ावा देकर किसानों की आय बढ़ा रही है। नतीजा यह है कि वहां ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और किसान बड़े पैमाने पर उत्पादन कर रहे हैं ।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि मध्यप्रदेश सरकार आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की इस पोषणयुक्त खेती को बढ़ावा देने से क्यों पीछे है ? यह मुद्दा प्रदेश के मंत्रियों और नीति-निर्माताओं तक पहुंचना जरूरी है, ताकि मवई जैसे क्षेत्रों में कोदो-कुटकी को प्रोत्साहित कर किसानों को आर्थिक मजबूती और युवाओं को रोजगार मिल सके।

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