सामुदायिक पुलिसिंग के उदाहरण रहे के डी पाराशर का निधन

सतना:मध्यप्रदेश पुलिस सेवा के इतिहास में कुछ ऐसे नाम दर्ज हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को ईमानदारी, निष्ठा और सिद्धांतों का मार्ग दिखाते रहेंगे. ऐसे ही अद्वितीय व्यक्तित्व थे भारतीय पुलिस सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी केशव दत्त पाराशर (के.डी. पाराशर), जिनका रविवार को निधन हो गया. उनके जाने से पुलिस विभाग ही नहीं, पूरा समाज एक सजीव मिसाल और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति से वंचित हो गया है.

वे मानते थे कि परिवार भी हमेशा ईमानदारी को पसंद नहीं करता, लेकिन यदि एक बार समझौता कर लिया तो जीवन भर पश्चाताप करना पड़ता है.श्री पाराशर वर्ष 2011 में सीहोर जिले से पुलिस अधीक्षक पद से सेवानिवृत्त हुए और उसके बाद ग्वालियर के दीनदयाल नगर में बस गए. सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने अपने सादे जीवन और निष्कलंक छवि के कारण समाज में सम्मानजनक स्थान बनाए रखा.

भोपाल पुलिस मुख्यालय में जब भी नए अधिकारी पदस्थ होते, तो पाराशर साहब की ईमानदारी के किस्से ज़रूर सुनते. वे हर परिस्थिति में काम से समझौता न करने के लिए जाने जाते थे. अपराध घटित होते ही वे दिन-रात बिना थके सक्रिय रहते और अपराधियों को पकड़ने में जुट जाते. उनकी कार्यशैली ऐसी थी कि वरिष्ठ अधिकारियों को भी कोई मौका नहीं देते थे.उनके किस्से आज भी पुलिसकर्मियों के बीच दंतकथाओं की तरह सुनाए जाते हैं. सहकर्मी और मातहत अधिकारी अक्सर कहते थे—“पाराशर साहब जैसे अफसर फिर नहीं आएँगे.” उनकी ईमानदारी और सादगी इतनी गहरी थी कि उनका नाम विभाग में मानक बन चुका था.शोकाकुल परिवार में उनके भाई मुरारीलाल पाराशर और अशोक पाराशर, पुत्र दीपेश पाराशर और अनिवेश पाराशर सहित पूरा पाराशर परिवार सम्मिलित है. उनकी अंतिम यात्रा निज निवास, दीनदयाल नगर से मुरार मुक्तिधाम के रविवार को निकली.
ईमानदारी की अमर विरासत
श्री पाराशर का जीवन इस बात का प्रतीक रहा कि ईमानदारी केवल एक गुण नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है. उन्होंने कभी भी परिस्थितियों से समझौता नहीं किया. वरिष्ठ अधिकारियों से लेकर आम पुलिसकर्मियों तक, सभी उन्हें एक ऐसे अधिकारी के रूप में जानते थे जो अपने सिद्धांतों से ज़रा भी विचलित नहीं होते थे. उनके निधन से समाज ने एक ऐसे व्यक्तित्व को खोया है जिसकी सबसे बड़ी विरासत ईमानदारी और निष्पक्षता है. आने वाली पीढ़ियां उनसे यह प्रेरणा लेती रहेंगी कि यदि इच्छाशक्ति प्रबल हो तो किसी भी व्यवस्था में सत्य और निष्ठा की लौ सदैव जलाए रखी जा सकती है

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