हाईकोर्ट का अहम आदेश : विचारण न्यायालय की भूमिका डाकिया जैसी नहीं 

जबलपुर। हाईकोर्ट जस्टिस ए के पालीवाल की एकलपीठ ने अपने अहम आदेश में कहा है कि विचारण न्यायालय की भूमिका डाकिया (पोस्ट मास्टर) की तरह केवल शिकायत मिलते ही संज्ञान की मुहर लगा देने की नहीं है। न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह शिकायत का प्रारंभिक परीक्षण करे और यह सुनिश्चित करे कि संज्ञान लेने के लिए पर्याप्त आधार मौजूद हैं। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ आपराधिक मामले को रद्द करते के आदेश जारी किये है।

याचिकाकर्ता शिवकुमार निगम की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि वह पंजाब नेशनल बैंक की भरतीपुर शाखा जबलपुर में वरिष्ठ प्रबंधक थे। इस दौरान श्रीमती मधु सोनकर ने एक मारुति कार खरीदने के लिए बैंक से ऋण लिया था, लेकिन किस्तों का भुगतान नहीं करने पर डिफाल्टर हो गई थी। ऋण की बकाया राशि चुकाने के लिए उन्होंने बैंक को दो लाख का चेक जारी किया। बैंक खाता पहले से बंद होने के कारण चेक अनादरण हो गया। जिसके बाद श्रीमती सोनकर के खिलाफ धारा 138 के तहत मुकदमा दायर किया, जो न्यायालय में लंबित था।

याचिका में कहा गया था कि लंबित मामले के आधार पर श्रीमती सोनकर ने दुर्भावना युक्त निजी परिवाद दायर किया। जिसमें कहा गया कि चेक में उनके हस्ताक्षर थे पर राशि उनके द्वारा नहीं लिखी गयी है। इस तरह बैंक प्रबंधक ने उसके साथ धोखाधड़ी व जालसाजी की है। संबंधित न्यायालय ने परिवाद की सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ धारा 420, 467 और 468 के तहत प्रकरण दर्ज करने के आदेश जारी किये है।

एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामला मूल रूप से एक ऋण संबंधी दीवानी विवाद है। जिसे आपराधिक मामला बना दिया गया था। आपराधिक कानून का उपयोग दीवानी ऋणों की वसूली के लिए नहीं किया जा सकता। एकलपीठ ने उक्त आदेश के साथ आपराधिक मामला निरस्त करने के आदेश जारी किये है। याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता राजेश सिंह चौहान, आशीष त्रिवेदी, असीम त्रिवेदी, आनंद शुक्ला ने पैरवी की।

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