नयी दिल्ली, 13 सितंबर (वार्ता) वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा की आकांक्षा रखने, संचालन और परिचालन को अधिक सुदृढ़ करने और पारंपरिक तथा उभरते दोनों उद्योगों में क्षेत्रीय चैंपियन के रूप में अपनी भूमिका का विस्तार करने का आह्वान किया है।
वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) के सचिव एम. नागराजू ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के मंथन-2025 के आरंभिक सत्र में कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अस्तित्व और स्थिरता के चरण से आगे बढ़ चुके हैं और अब वे विकसित भारत 2047 की यात्रा में विकास, नवाचार और नेतृत्व के चैंपियन के रूप में एक बड़ी भूमिका निभाने की स्थिति में हैं।
इस दौरान हुई चर्चाओं में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बैंकों के रूप में विकसित होने की आकांक्षा रखनी चाहिये। इसके लिए उनके पास विदेशों में भारतीय उद्यमों का समर्थन करने और दुनिया भर के अग्रणी वित्तीय संस्थानों के साथ खड़े होने के लिए बड़े पैमाने के वित्तपोषण की क्षमता, उपस्थिति और अन्य जरूरी क्षमताएं होनी चाहिये।
डीएफएस द्वारा आयोजित दो दिवसीय ‘पीएसबी मंथन-2025’ शनिवार को गुरुग्राम में समापन हुआ।
कार्यक्रम के समापन पर जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति के अनुसार डीएफएस की अध्यक्षता में आयोजित इस मंथन में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के वरिष्ठ नेतृत्व के साथ-साथ, रिजर्व बैंक, उद्योग जगत के विशेषज्ञ, शिक्षाविद, प्रौद्योगिकीविद और बैंकिंग व्यवसायी के प्रतिनिधि शामिल थे। इसके विभिन्न सत्रों में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे.; सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन; सेबी के पूर्व अध्यक्ष एम. दामोदरन; आईआरडीएआई के पूर्व अध्यक्ष देबाशीष पांडा; आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर – आर गांधी, एन.एस. विश्वनाथन और एम.के. जैन; और एसबीआई के पूर्व अध्यक्ष रजनीश कुमार और दिनेश कुमार खारा ने संबोधित किया।
इन दो दिनों में मंथन शिविर में सात पैनल चर्चाएं, तीन विशेषज्ञ सत्र, एक फायरसाइड चैट और एक खुली चर्चा का सत्र हुआ। इनमें ग्राहक अनुभव, शासन, उद्देश्यपूर्ण नवाचार, ऋण वृद्धि, जोखिम प्रबंधन, कार्यबल तत्परता, प्रौद्योगिकी आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं जैसे विषयों पर चर्चा की गयी।
चर्चाओं में प्रक्रिया सरलीकरण, ग्राहक असंतोष का समय पर निवारण और निर्बाध सेवाएं प्रदान करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को अगली पीढ़ी की तकनीकों को अपनाने, साझा बुनियादी ढांचा या साझा उपयोगिताएं बनाने और विविध ग्राहक आवश्यकताओं के अनुरूप अति-वैयक्तिकृत उत्पाद डिजाइन करने के सुझाव दिये गये। वक्ताओं ने पारंपरिक प्रणालियों से आगे बढ़कर, निर्बाध डिजिटल सेवाएं प्रदान करने, साइबर सुरक्षा बढ़ाने और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के साथ प्रभावी ढंग से एकीकृत करने में सक्षम चुस्त और अंतर-संचालनीय प्लेटफार्मों की ओर बढ़ते हुये, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की प्रौद्योगिकी के आधुनिकीकरण के महत्व पर बल दिया।
इस दौरान यह भी सुझाव दिया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के लिए मजबूत शासन ढांचा स्थापित करें, जिसका उद्देश्य मॉडल जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना, जिम्मेदारी से एआई को अपनाना और उभरते जोखिमों के विरुद्ध उचित सुरक्षा उपाय स्थापित करना है।
वक्ताओं ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) की क्षमताओं को बढ़ाने और नवाचार को गति देने के लिए वित्तीय प्रौद्योगिकी, शिक्षा जगत, वैश्विक संस्थानों और उद्यमियों के साथ सहयोग के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी दोहराया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक न केवल वित्तीय समावेशन के लिए बल्कि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।
इस दौरान यह भी कहा गया कि कृषि, एमएसएमई, आवास और बुनियादी ढांचा क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने के साथ-साथ, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ग्रीन हाइड्रोजन, सेमीकंडक्टर, जहाज निर्माण और डिजिटल उद्योगों जैसे उभरते क्षेत्रों के प्रमुख प्रवर्तक के रूप में भी उभरना चाहिये।
विचार-विमर्श में मानव संसाधन प्रशिक्षण के महत्व पर भी जोर दिया गया और कहा गया कि कि प्रौद्योगिकी अपनाने को मौजूदा प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण से आगे बढ़कर सेवा वितरण की पुनर्कल्पना की ओर बढ़ना होगा, जिसका उद्देश्य दक्षता बढ़ाना, समावेशिता को बढ़ावा देना और ग्राहकों का विश्वास गहरा करना है।
पीएसबी मंथन 2025 में साझा दिशा-निर्देश तय किया गया जिसमें शासन, ग्राहक सेवा, प्रौद्योगिकी और ऋण वितरण के आसपास निकट-अवधि की प्राथमिकताएं निर्धारित की गईं, साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए सतत विकास के साथ तालमेल बिठाने और विकसित भारत 2047 के विजन को साकार करने हेतु विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी संस्थानों के रूप में विकसित होने हेतु एक दीर्घकालिक मार्ग की रूपरेखा भी तैयार की गई है।
