टिकट की जगह कागज का टुकड़ा थमाकर यात्रियों की जिंदगी से खिलवाड, दुर्घटना होने पर नहीं मिलेगा मुआवज़ा

मंडला।जिले में बस संचालन पूरी तरह से मनमानी पर उतर आया है। आरटीओ और प्रशासन की नाक के नीचे नियम-कायदों को ताक पर रखकर अनफिट बसें सड़कों पर दौड़ रही हैं। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि यात्रियों को टिकट की जगह एक कागज का टुकड़ा थमा दिया जा रहा है, जिसमें न बस नंबर दर्ज होता है और न ट्रेवल्स एजेंसी का नाम। किराया और यात्रा दूरी का जिक्र तक नहीं होता।

 

यात्रियों को दिए जाने वाले इन कागजों पर कंडक्टर पेन से घसीटकर किराया भर देता है, ताकि यह दिखाया जा सके कि यात्री ने भुगतान किया है। लेकिन यही तथाकथित टिकट किसी भी दुर्घटना, विवाद या बीमा क्लेम की स्थिति में यात्रा का प्रमाण तक नहीं बन पाता। मतलब साफ है— हादसा होने पर न तो मुआवज़ा मिलेगा और न ही राहत राशि।

 

हर रोज पांच से छह हजार यात्री ठगे जा रहे

 

बस स्टैंड से रोजाना सौ से ज्यादा बसें गुजरती हैं और करीब पांच से छह हजार यात्री सफर करते हैं। लेकिन स्थिति यह है कि लगभग हर बस का टिकट एक जैसा ही होता है— अधूरा, बिना नाम और बिना नंबर। ग्रामीण क्षेत्रों की हालत तो और बदतर है, जहां कई बसें टिकट तक देना बंद कर चुकी हैं और ओवरलोड सवारियां बैठाकर सीधा नियमों की धज्जियां उड़ा रही हैं।

 

मंडला निवासी रंजीत रॉय का कहना है कि वे राजा राम ट्रेवल्स की बस से जबलपुर गए थे। उन्हें टिकट के नाम पर सिर्फ एक छोटा कागज दिया गया, जिसमें न बस सर्विस का नाम था और न ही बस क्रमांक। यही हाल जिले की अधिकांश बसों का है।

 

बस स्टैंड पर किराया सूची गायब, मनमानी वसूली आम

 

बस स्टैंड परिसर में कहीं भी किराया सूची प्रदर्शित नहीं की जाती। ऐसे में यात्रियों से मनमाना किराया वसूला जा रहा है। यह मनमानी अक्सर विवाद का कारण बनती है। चौंकाने वाली बात यह है कि यह खेल वर्षों से जारी है, लेकिन न प्रशासन और न ही आरटीओ ने अब तक कोई कार्रवाई की है।

 

50 रुपए में बिक रही टिकट बुक, डॉक्टर की पर्ची जैसी लिखावट

 

जांच में यह बात सामने आई है कि बस संचालक अपनी अलग टिकट बुक छपवाने के बजाय बाजार से महज 50 रुपए में साधारण टिकट बुक खरीद लेते हैं। इन्हीं पर पेन से घसीटकर किराया लिखकर यात्रियों को थमा दिया जाता है। मंडला से जबलपुर, डिंडौरी, बालाघाट और घंसौर रूट पर ऐसी शिकायतें अधिक मिल रही हैं। यात्रियों को दी जाने वाली टिकटों पर लिखावट इतनी खराब होती है कि उसे पढ़ना तक मुश्किल हो जाता है।

यात्रियों की सुरक्षा से हो रहा खिलवाड़

बिना नाम और नंबर वाले टिकट केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा और अधिकारों से सरासर खिलवाड़ है। हादसा होने पर यात्रियों को यह साबित करना भी मुश्किल होगा कि वे बस में सफर कर रहे थे।

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