उच्चतम न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर केंद्र, ईडी, सीबीआई और अनिल अंबानी से जवाब मांगा

नयी दिल्ली, 18 नवंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) और व्यवसायी अनिल अंबानी से एक जनहित याचिका पर जवाब माँगा है। इस याचिका में रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) और इस समूह की अन्य संस्थाओं की ओर से कथित तौर पर बैंकों के रिण के दुरूपयोग और बड़े पैमाने पर हुई बैंक धोखाधड़ी की अदालत की निगरानी में जाँच की माँग की गयी है।
केन्द्र सरकार के पूर्व सचिव ईएएस सरमा की ओर से दायर इस याचिका में भारत के ‘सबसे बड़े कॉर्पोरेट धोखाधड़ी’ में से एक में धन के व्यवस्थित दुरुपयोग, खातों में हेराफेरी और संस्थागत मिलीभगत का आरोप लगाया गया है।
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति विनोद चंद्रन की पीठ ने नोटिस जारी कर केंद्र, सीबीआई, ईडी और अंबानी को तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया, “यह संभवतः भारत के इतिहास की सबसे बड़ी कॉर्पोरेट धोखाधड़ी है। एफआईआर 2025 में ही दर्ज की गयी जबकि धोखाधड़ी 2007-08 से चल रही है।”
न्यायालय के पूछने पर कि क्या याचिका की प्रतियाँ प्रतिवादियों को दी गई हैं, अधिवकता प्रशांत भूषण ने अनुरोध किया कि सीबीआई और ईडी दोनों से स्थिति रिपोर्ट मँगवाई जाए। इसके बाद अदालत ने औपचारिक रूप से एक नोटिस जारी किया।
याचिका के अनुसार, 21 अगस्त, 2025 की सीबीआई की प्राथमिकी और उससे जुड़ी ईडी की कार्यवाही कथित गड़बड़ी के केवल एक छोटे से अंश तक ही सीमित है, जबकि फोरेंसिक ऑडिट और स्वतंत्र आकलनों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की ओर इशारा किया गया है। इसके बावजूद जाँच एजेंसियों ने बैंक अधिकारियों और वित्तीय नियामकों की संलिप्तता की जाँच नहीं की है।
जनहित याचिका में कहा गया है कि 2013 और 2017 के बीच फोरेंसिक ऑडिट के निष्कर्षों के अनुसार, आरकॉम और उसकी सहायक कंपनियों रिलायंस इंफ्राटेल और रिलायंस टेलीकॉम को भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के नेतृत्व वाले बैंकों के एक संघ से कथित तौर पर 31,580 करोड़ रुपये का ऋण मिला।
एसबीआई द्वारा कराए गए एक फोरेंसिक ऑडिट में कथित तौर पर पाया गया कि ऋण की राशि का उपयोग दूसरे ऋणों के भुगतान के लिए किया गया था। याचिका के अनुसार धन को संबंधित पक्षों को हस्तांतरित किया गया, निवेशों के ‘एवरग्रीनिंग’ को छिपाने के लिए धन का अलग-अलग मार्गों से प्रयोग किया गया और निवेश के तुरंत बाद ही संपत्तियों को बेच दिया गया। ‘क्लोज्ड’ खातों से यह लेन देन किया गया जो सभी फर्जी वित्तीय विवरणों का संकेत देते हैं।
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि नेटिज़न इंजीनियरिंग और कुंज बिहारी डेवलपर्स सहित फर्जी संस्थाओं का इस्तेमाल धन की हेराफेरी और धनशोधन के लिए किया गया था।इसके साथ ही फर्जी वरीयता शेयर समझौतों से 1,800 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान हुआ।
एक प्रमुख शिकायत यह थी कि अक्टूबर 2020 में फोरेंसिक ऑडिट प्रस्तुत किए जाने के बावजूद एसबीआई ने आपराधिक कार्यवाही शुरू करने में लगभग पाँच साल की देरी की। एसबीआई ने अगस्त 2025 में ही शिकायत दर्ज कराई जिससे याचिकाकर्ता के अनुसार, ‘संस्थागत मिलीभगत’ का संकेत मिलता है।
याचिका में तर्क दिया गया है कि चूँकि राष्ट्रीयकृत बैंकों के अधिकारियों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत लोक सेवक माना जाता है, इसलिए उनके आचरण की भी जाँच आवश्यक है। याचिका में अन्य लेन-देन का भी हवाला दिया गया है, जिसमें अनिल अंबानी के नेतृत्व वाली अन्य संस्थाओं में कथित अनियमितताओं का भी उल्लेख है, जिसमें रिलायंस कैपिटल की नकारात्मक नेटवर्थ वाली सहायक कंपनियों को 16,000 करोड़ रुपये की अंतर-कॉर्पोरेट जमा राशि भी शामिल है।
याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय की निगरानी में सभी फोरेंसिक ऑडिट निष्कर्षों, दिवालियेपन से संबंधित सामग्रियों का विभिन्न कानूनों के तहत संभावित अपराधों को शामिल करते हुए एक जाँच की मांग की है।
सभी प्रतिवादियों द्वारा अपने जवाब दाखिल करने के बाद मामले की अगली सुनवाई होगी।

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