संगठन की साख पर सवाल था, इसलिए विधायक को देनी पड़ी कड़ी नसीहत

ग्वालियर चंबल डायरी

हरीश दुबे

भिंड विधायक और कलेक्टर के दरम्यान हुए विवाद एवं सार्वजनिक रूप से एक दूसरे की औकात नापे जाने की अभूतपूर्व घटना ने सरकार और संगठन, की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दिया। इस विवाद के चलते सरकार की छवि धूमिल होती दिखी तो तुरंत संगठन हरकत में आया और विधायक नरेन्द्र सिंह कुशवाह को शोकाज अल्टीमेटम पर भोपाल तलब कर उनकी क्लास ले ली गई। संगठन महामंत्री हितानंद के बंगले पर लगी क्लास में प्रदेश प्रधान हेमंत खंडेलवाल और प्रदेश प्रभारी महेंद्र सिंह ने विधायक महोदय को साफ संदेश दे दिया कि यह कृत्य अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति हुई तो विधायक को सख्त एक्शन का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा।

भोपाल से लौटने के बाद विधायक के तेवर पहले जैसे तल्ख नहीं रह गए हैं, हालांकि विधायक और कलेक्टर, दोनों तरफ से सिटी कोतवाली में एक दूसरे के खिलाफ शिकायती आवेदन दिए गए हैं। संगठन के कड़े रुख का यह असर हुआ कि इस पूरे मसले पर विधायक इस मसले पर अपनी ही पार्टी में अलग थलग पड़ गए। हालांकि प्रशासन के हिटलरी अंदाज से पीड़ित रहा पार्टी का एक तबका अभी भी विधायक को हवा देने में जुटा है लेकिन विधायक महोदय दूध के जले हैं, इसलिए अब छाछ को भी फूंक फूंक कर पी रहे हैं। कोई उनका साथ दे या न दे, शिवपुरी जिले की पिछोर सीट के भाजपा विधायक प्रीतम लोधी जरूर नरेन्द्र कुशवाह के साथ खड़े दिखाई दिए। चूंकि अपने तेज तर्रार अंदाज के चलते प्रीतम लोधी की पुलिस और प्रशासन से कभी नहीं बनी और वे खुद को सदैव प्रशासन उत्पीड़ित मानते रहे, लिहाजा प्रीतम को भिंड के विधायक में अपना अक्स नजर आया।

दोनों तरफ कार्यकारिणी का इंतजार

चंबल संभाग के सभी जिलों में भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों में जिला कार्यकारिणी का इंतजार चल रहा है। दोनों दलों में लंबे समय बाद नेतृत्व परिवर्तन हुआ है। अध्यक्ष बदले जाने के साथ ही पुरानी कार्यकारिणी स्वमेव विसर्जित मान ली जाती है लेकिन दोनों दलों के अध्यक्ष फिलहाल निवर्तमान अध्यक्षों की कार्यकारिणी से ही पार्टी चला रहे हैं। हालांकि भाजपा में अध्यक्ष बदले हुए महीने बीत गए हैं लेकिन वहां नई कार्यकारिणी का कोई हील हवाला ही नजर नहीं आ रहा था। प्रभारी संगठन महामंत्री बीएल संतोष यदि भोपाल तशरीफ लाकर जवाब तलब नहीं करते तो अभी भी नई कार्यकारिणी की प्रक्रिया सौ दिन चले अढ़ाई कोस की स्थिति में होती। नए कांग्रेस सदर भी ग्वालियर के बड़े नेताओं से कार्यकारिणी में एडजेस्ट करने के लिए उनके समर्थकों की सूची तलब करने जा रहे हैं। इस बीच तीसरी बार ग्रामीण जिलाध्यक्ष बने पीडी जौहरे के आज अचानक दिल्ली रवाना होने से पार्टी वीथिकाओं में नई चर्चाएं चल पड़ीं।

क्या भविष्य में भी बनी रहेगी प्रशासन की निष्पक्षता व सतर्कता

सरकारें आती जाती रहती है, सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष चुनावी भंवर में से निकलकर एक दूसरे का स्थान लेते हैं, चूंकि सत्ता चिर स्थाई नहीं है, लिहाजा कार्यपालिका को अपनी निष्पक्षता बनाए रखनी होती है, यही लोकतंत्र का उसूल है। ग्वालियर का जिला प्रशासन और पुलिस तंत्र फिलहाल तो इसी उसूल पर चलता दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी और जीतू पटवारी के विवादित बयानों से नाराज भाजपा ने जब ग्वालियर में कांग्रेस दफ्तर पर जंगी प्रदर्शन। का ऐलान किया तो पुलिस और प्रशासन फौरन हरकत में आया और कांग्रेस दफ्तर से सौ मीटर दूर तक इतना सख्त सुरक्षा घेरा बना दिया कि परिंदा भी पर न मार सके।

हालांकि कांग्रेस वालों ने चुनौती देने आ रहे भगवाधारियों को जवाब देने के लिए अपने स्तर पर तैयारी कर रखी थी लेकिन पुलिस बीच में दीवार बनकर खड़ी हो गई। हां, पुलिस इतने कड़े सुरक्षा प्रबंध नहीं करती तो शिंदे की छावनी पर कहानी कुछ और लिखी जाती। बहरहाल, यह पहली मर्तबा हुआ कि किसी राजनीतिक ईवेंट के बाद सत्तादल और प्रतिपक्ष, किसी की भी तरफ से प्रशासन के सलूक को लेकर कोई शिकायत नहीं आई। हालांकि, यह भी सच है कि शासन और प्रशासन में बैठे अफसरान राजनीतिक दवाब और सत्ताधीशों के हाथों में थामी तबादले की तलवार के भय के चलते ऐसी निष्पक्षता लंबे समय तक नहीं बना पाते।

ग्वालियर की कॉन्क्लेव में सिंधिया का न आना

ग्वालियर में चली दो रोजा ‘रीजनल टूरिज्म कॉन्क्लेव’ में सिंधिया का न आना सभी के लिए अचंभे की बात रही। जहां ग्वालियर के विकास का खाका खींचने दुनिया जहान के निवेशक जमा हों, वहां सिंधिया की गैर मौजूदगी हो, इसे कुछ लोग सातवां अजूबा मानते हैं। बहरहाल, खबर यही छनकर आई कि विकास कार्यों का स्वयं श्रेय लेने संबंधी नरेंद्र सिंह तोमर के कटाक्ष की पीड़ा को महाराज अब तक भूले नहीं हैं। वैसे यह कॉन्क्लेव कामयाब रही। 3500 करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए तो सौ करोड़ से राजा मानसिंह के किला को रेनोवेट करने पर भी प्रपोजल बना है।

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