नयी दिल्ली, 03 सितम्बर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने छत्तीसगढ़ के एक निजी अस्पताल में बच्चा बदलने के आरोपों की जांच की मांग वाली विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर बुधवार को नोटिस जारी किया। डीएनए परीक्षण से पता चला है कि याचिकाकर्ताओं को दी गयी दो बच्चियों में से केवल एक ही लड़की उनकी जैविक संतान है जबकि दूसरी बच्ची से उनका डीएनए नहीं मिला है
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि महिला ने एक लड़के और एक लड़की को जन्म दिया था लेकिन अस्पताल ने उसे बताया कि उसने दो लड़कियों को जन्म दिया है। यह विशेष अनुमति याचिका एओआर चंद कुरैशी के माध्यम से दायर की गई जिसमें याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अशोक कुमार पाणिग्रही उपस्थित हुए।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा, “इसलिए यह स्पष्ट रूप से बच्चा बदलने का मामला है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, ऐसी परिस्थितियों में गहन विश्लेषण के बाद ही जांच को निर्देशित करना चाहिए था जबकि उच्च न्यायालय ने सभी पहलुओं की जांच किए बिना ही याचिका को सरसरी तौर पर खारिज कर दिया।”
याचिकाकर्ताओं ने पहले छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर अपनी शिकायत की प्रारंभिक जांच और संबंधित डॉक्टर एवं अस्पताल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी। उन्होंने अपने कथित रूप से अपहृत बच्चे की बरामदगी एवं उसकी कस्टडी की भी मांग की थी। डीएनए परीक्षण से पुष्टि हुयी कि एक बच्ची जैविक रूप से उनकी है जबकि दूसरी बच्ची का डीएनए मेल नहीं खाता है।
लेकिन इस मामले में छह डॉक्टरों की एक जांच समिति ने कहा कि अस्पताल के सभी रिकॉर्ड सही थे और उन्हें बच्चा चोरी का कोई सबूत नहीं मिला। इस पर भरोसा करते हुए उच्च न्यायालय ने रिट याचिका को खारिज करते हुये कहा कि इसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय इस बात पर विचार करने में विफल रहा कि क्या याचिकाकर्ताओं की शिकायत की पर्याप्त जांच की गयी, विशेष रूप से दो पहलुओं पर कि क्या मां ने वास्तव में एक लड़के और एक लड़की को जन्म दिया था और क्या डीएनए रिपोर्ट में यह स्थापित हुआ कि अस्पताल द्वारा सौंपे गए दोनों बच्चे याचिकाकर्ताओं की जैविक संतान थे।
डीएनए साक्ष्य और याचिकाकर्ताओं की दलीलों पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्य्यालय ने एसएलपी पर नोटिस जारी किया।