सुप्रीम कोर्ट में पोश अधिनियम की प्रतिबंधात्मक व्याख्या के खिलाफ याचिका

नयी दिल्ली, 03 सितंबर (वार्ता) उच्चतम न्यायालय में एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर केरल उच्च न्यायालय के 2022 के एक फैसले को इस आधार पर चुनौती दी गयी है, जिसमें कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (पोश अधिनियम) के महत्व की पुष्टि तो की गयी है मगर वह कानून की “संकीर्ण एवं प्रतिबंधात्मक” व्याख्या है।

संविधान के अनुच्छेद 136 के अंतर्गत अधिवक्ता योगमाया एम.जी. ने याचिका में उच्च न्यायालय के 17 मार्च, 2022 के फैसले की आलोचना की है।

गौरतलब है कि केरल उच्च न्यायालय ने वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव बनाम केरल राज्य नामक उस मामले में फैसला सुनाया था जो कार्यस्थलों पर आंतरिक शिकायत समितियों के गठन से संबंधित है, जिसमें कार्यस्थल उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 ) या कार्यस्थल उत्पीड़न अधिनियम 2013 के तहत “नियोक्ता” के दायरे पर चर्चा की गई थी। यह फैसला वीमेन इन सिनेमा कलेक्टिव बनाम केरल राज्य मामले से संबंधित था। मामले का मुख्य विषय कार्यस्थलों में आंतरिक शिकायत समितियों के गठन पर था।

वह निर्णय कार्यस्थल उत्पीड़न निवारण अधिनियम, 2013 के संदर्भ में “नियोक्ता” की परिभाषा और उसके दायरे से जुड़ा था।

उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अधिनियम के तहत “नियोक्ता” के दायरे में कार्यस्थल प्रबंधन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के लिए जिम्मेदार व्यक्ति, बोर्ड या समिति भी शामिल हो सकते हैं।

विशेष अनुमति याचिका दायर करने वाले याचिकाकर्ताओं के अनुसार, इस निर्णय ने अनौपचारिक, स्वतंत्र या गैर-पारंपरिक कार्य क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं की बड़ी श्रेणियों, विशेष रूप से फिल्म, मीडिया एवं राजनीतिक क्षेत्रों में कार्यरत महिलाओं को अधिनियम के संरक्षण से प्रभावी रूप से बाहर कर दिया है।

याचिका में इस बात पर बल दिया गया है कि औपचारिक एवं अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में महिलाओं की सुरक्षा के लिए पोश अधिनियम को जानबूझकर “नियोक्ता”, “कर्मचारी” और “कार्यस्थल” की व्यापक परिभाषाओं के साथ लागू किया गया जो विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) और मेधा कोतवाल लेले बनाम भारत संघ (2013) में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसलों के बाद किया गया है।

याचिका के अनुसार, केरल उच्च न्यायालय ने कानून की प्रासंगिकता को तीन प्रमुख मामलों में सीमित कर दिया: आंतरिक शिकायत समितियां (आईसीसी) केवल 10 से अधिक कर्मचारियों वाली व्यक्तिगत फिल्म निर्माण इकाइयों के लिए अनिवार्य हैं, मलयालम फिल्म कलाकार महासंघ (एएमएमए) या केरल फिल्म कर्मचारी महासंघ(एफईएफकेए) जैसे शक्तिशाली संगठनों के लिए नहीं; राजनीतिक दल जिनके पास पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संरचना नहीं है वह आईसीसी का गठन करने के लिए बाध्य नहीं हैं। दस से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में महिलाओं को केवल स्थानीय शिकायत समितियों पर निर्भर रहना पड़ता है।

याचिका में चेतावनी देते हुए कहा गया कि इस प्रकार के प्रतिबंधों के कारण सिनेमा, टेलीविजन, मीडिया एवं राजनीति में महिलाओं के उत्पीड़न के खिलाफ प्रभावी उपाय नहीं होते। राजनीति में यह स्थिति विशेष रूप से गंभीर है जहां भारत के 2,700 पंजीकृत राजनीतिक दलों में से अधिकांश के पास औपचारिक आईसीसी नहीं हैं और माकपा जैसे केवल कुछ ही दलों ने इसे स्वेच्छा से स्थापित किया है।

संयुक्त राष्ट्र महिला (2013) और अंतर-संसदीय संघ (2016) द्वारा किए गए अध्ययनों का हवाला देते हुए याचिका में तर्क दिया गया है कि राजनीति में यौन उत्पीड़न एक वैश्विक वास्तविकता है और भारत को इसे अनदेखा नहीं करना चाहिए। याचिका में कहा गया है कि उच्च न्यायालय का संकीर्ण दृष्टिकोण संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(जी) और 21 के साथ-साथ सीईडीएडब्ल्यू के अंतर्गत भारत के अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को भी कमज़ोर करता है।

याचिकाकर्ता इस बात को लेकर स्पष्टता चाहते हैं कि राजनीतिक दल और उद्योग संघ पोश अधिनियम के अंतर्गत आते हैं तथा विशाखा दिशानिर्देशों और संवैधानिक गारंटी के अनुरूप प्रभावी आईसीसी या क्षेत्रीय तंत्र के लिए निर्देश चाहते हैं।

यह याचिकाकर्ताओं का उच्चत्तम न्यायालय में किया गया पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले उन्होंने डब्ल्यू.पी (सी) संख्या 816/2024 और डब्ल्यू.पी (सी) संख्या 695/2025 दायर की थी। पिछले महीने मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली बेंच ने राजनीतिक दलों को पोश अधिनियम के दायरे में लाने के लिए तत्काल निर्देश देने की मांग वाली एक अलग याचिका पर यह कहकर विचार करने से इनकार कर दिया था कि यह मामला संसद के अधिकार क्षेत्र में है। उच्चतम न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ एसएलपी दायर करने का सुझाव दिया था जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान याचिका दायर की गयी है।

 

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