सेवा के लिए मन चाहिए, साधन अपने आप जुट जाते हैं- भैयाजी जोशी

खरगोन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य भैयाजी जोशी एक दिवसीय प्रवास पर गुरुवार को शहर पहुंचे। राधाकुंज परिसर के सभागृह में आयोजित सेवा संस्था बैठक में उन्होंने खरगोन, बड़वाह, सेंधवा एवं बड़वानी जिले के 50 से अधिक सेवा संस्थाओं तथा 120 से अधिक समाजसेवियों को संबोधित किया। इस अवसर पर मातृशक्ति सहित आध्यात्मिक क्षेत्र और समाज सेवा में सक्रिय कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

सभा को संबोधित करते हुए श्री जोशी ने कहा कि हमें सेवा का अवसर मिला है, यह हमारा सौभाग्य है। सेवा केवल सहायता भर नहीं, बल्कि जिस व्यक्ति की सेवा की जा रही है उसे ईश्वर मानकर की जानी चाहिए। सेवा का लक्ष्य केवल तात्कालिक सहायता नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर और संस्कारवान व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। उन्होंने सेवा को भारतीय संस्कृति का प्राणतत्व बताते हुए कहा कि हमारी परंपरा में सेवा कभी दिखावे या प्रसिद्धि का साधन नहीं रही, बल्कि यह जीवन का सहज आचरण है। उदाहरण देते हुए कहा कि माता अपने बच्चे की सेवा करती है, तो वहां कोई उपकार नहीं, बल्कि ममता और कर्तव्य का भाव होता है। ठीक उसी प्रकार समाज के पीडि़त, वंचित और जरूरतमंद वर्ग की सेवा भी कर्तव्यबोध से की जानी चाहिए।

श्री जोशी ने कहा कि सेवा का सबसे बड़ा स्वरूप है, व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाना। यदि कोई सेवाभावी संगठन किसी को शिक्षित करता है, कौशल प्रदान करता है या संस्कार देता है, तो वह केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज को संबल देता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सेवा का परिणाम आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और स्वावलंबन जगाने वाला होना चाहिए, ताकि सेवाग्राही स्वयं भी आगे चलकर समाज सेवा में योगदान कर सके। उनके अनुसारए भारत की दृष्टि नर सेवा ही नारायण सेवा होनी चाहिए। सेवा उपकार नहीं, परोपकार है और यह जीवन का परमोधर्म है। भैयाजी जोशी ने सामाजिक कार्य की परिधि को चार शब्दों में समेटते हुए कहा- सेवा, संस्कार, जागरूकता और सामाजिक सुधार। इन्हीं आधारों पर सशक्त और विकसित समाज का निर्माण संभव है।

सेवाभावी कार्यकर्ताओं से आग्रह किया कि सेवा कार्यों के माध्यम से समाज को आत्मनिर्भर, आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाते हुए संस्कारवान व्यक्तित्व का निर्माण करें। यही सेवा की श्रृंखला है, यही सच्ची राष्ट्रसेवा है।

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