-श्री वाई.एस. चक्रवर्ती, एमडी और सीईओ, श्रीराम फाइनेंस लिमिटेड
भारत की लॉजिस्टिक की कहानी अक्सर तेजी से फैलते हाईवे, अत्याधुनिक वेयरहाउसिंग और तकनीकी चलित प्लेटफार्म के माध्यम से सुनाई जाती है। लेकिन इस कहानी में एक अहम किरदार है जिसे इन चर्चाओं में स्थान नहीं मिलता। वह है कमर्शियल वाहन(सीवी) की फाइनेंसिंग। वास्तविकता में इसकी भूमिका बाकी किरदारों जितनी अहम है। यह वह पुल है जो सपनों को हकीकत में बदलने का रास्ता बनाता है। खासतौर पर पहली पीढ़ी के उद्यमियों और ऐसे मालिक जिनके पास वाहन कम संख्या (फ्लीट) है। इस तबके की कोई फार्मल क्रेडिट हिस्ट्री ही नहीं होती।
जैसे-जैसे भारत 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी की ओर बढ़ रहा है। पीएम गति शक्ति, नेशनल लॉजिस्टिक्स पॉलिसी और इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) आधारित उपायों से यह बिलकुल साफ हो गया है कि इन सुधारों की सफलता केवल इंफ्रास्ट्रक्चन तैयार करने तक ही सीमित नहीं, बल्कि कर्ज की उपलब्धता पर भी निर्भर करती है। भोपाल के एक ट्रक चालक या गुवाहाटी के एक छोटे वितरण सहयोगी के लिए फाइनेंसिंग केवल एक लेन-देन नहीं है, बल्कि ख्वाबों को यथार्थ में बदलने जैसा है।
आखिरी पड़ाव तक की माल ढुलाई की यात्रा में सीवी फाइनेंस की भूमिका
माल ढुलाई या रसद प्रबंधन में चुनौतियां केवल लंबी दूरी की आवाजाही तक सीमित नहीं है। आज, टियर 2, टियर 3 शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में मांग तेजी से बढ़ रही है। इन स्थानों पर ई-कॉमर्स, कृषि से संबंधित माल की ढुलाई और तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता सामान (एफएमसीजी)की आपूर्ति तेजी से बढ़ रही हैं। इन बाजारों में सीवी फाइनेंसिंग केवल वाहन खरीदने में ही मददगार नहीं हैं, वास्तव में वे रोजी रोटी का साधन हैं।
कई छोटे व्यापारियों, अल्पकालिक छोटे सहयोगी (गिग वर्कर) और वाहनों के छोटे समूह के संचालक की फाइनेंस तक पहुंच ही उन्हें माल ढुलाई तंत्र का हिस्सेदार बनने लायक बनाती है। देश के पारंपरिक बैंक, आय प्रमाण पत्र, क्रेडिट स्कोर और सुरक्षा गारंटी के सख्त नियमों से बंधे हैं। वे अक्सर लॉजिस्टिक क्षेत्र के छोटे कर्जधारकों खासतौर पर शहरों में आखिरी पड़ाव की डिलीवरी करने वालों को कर्ज नहीं देते।
गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) और छोटे वित्त बैंक (एसएफबी) इस अंतर को पाटने में अहम भूमिका निभाते हैं। जोखिम का सरल मूल्यांकन, स्थानीय उपलब्धता और ईंधन खर्च, उपयोगिता बिल और अन्य अनौपचारिक आय स्रोतों जैसे वैकल्पिक क्रेडिट डेटा का आकलन करके, वे हजारों लोगों को उनका पहला कमर्शियल वाहन खरीदने में सक्षम बनाते हैं। कई मायनों में, सीवी फाइनेंसिंग आज केवल बेड़े के विस्तार तक सीमित नहीं। आज यह पहुंच को बढ़ाने और आजीविका कमाने में सक्षम बनाने का काम कर रहा है।
ऑनलाइन कर्ज की प्रक्रिया और मानकीकरण
पिछले कुछ वर्षों में सीवी लोन क्षेत्र को डिजिटल टूल ने नया रूप दिया है। पहले कागजी प्रक्रिया और लंबी जांच की जरूरत होती थी। अब वह सब स्मार्टफोन के जरिए हो जाता है। ई-केवाईसी और टेलीमैटिक्स से लेकर वैकल्पिक क्रेडिट स्कोरिंग तक, कर्ज देने वाले अब तकनीक और व्यवहारिक डेटा का उपयोग करके कर्ज लेने वाले की मंशा और अदायगी की क्षमता का आकलन कर रहे हैं।
यह बदलाव ग्रामीण बाजारों में खासतौर पर बेहद अहम साबित हुआ है। वहां औपचारिक दस्तावेज सीमित हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया अब कर्जदाता को पैटर्न का विश्लेषण करने में मदद करती हैं। जैसे कि वाहन का उपयोग कितनी बार होता है, कर्ज अदायगी में कितना अनुशासन है।
यहां तक कि ईंधन का उपयोग, जिससे क्रेडिट योग्यता का वास्तविक समय में आकलन हो पाता है। इस बीच, यूपीआई या डिजिटल वॉलेट के माध्यम से कर्ज की सेवा देने से संग्रह तक आसान हो गया है और अदायगी का अनुशासन बनता है। यह सब भारत के “कम बैंकिंग सुविधा वाले और पूरी तरह से वंचित” लोगों को धीरे- धीरे औपचारिक वित्तीय तंत्र में शामिल करने की दिशा में एक कदम है।
ईवी क्रांति: फाइनेंसिंग का बढ़ता अवसर
जैसे-जैसे भारत हरित यातायात, खासतौर पर इलेक्ट्रिक वाणिज्यिक वाहनों और एलएनजी संचालित ट्रकों की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे सीवी फाइनेंसिंग को भी विकसित होना होगा। प्रोत्साहन, कम ऑपरेटिंग लागत और टिकाउ लक्ष्यों के कारण अधिकतर कारोबार अब शहरी लॉजिस्टिक्स के लिए ईवी की खोज कर रहे हैं।
हालांकि, ईवी फाइनेंसिंग इतनी आसान नहीं। कर्ज देने वाले बैटरी की लाइफ, शेष मूल्य और रिसेल जैसे अनिश्चितता जैसे सवालों से जूझ रहे हैं। जवाब में, बैटरी किराए पर देना, रखरखाव शामिल कर्ज, और उपयोग आधारित अदायगी योजनाएं जैसे नए विकल्प उभर रहे हैं। फेम-II और राज्य सब्सिडी के माध्यम से सरकारी समर्थन इसको गति दे रहा है। लेकिन इस क्षेत्र को बढ़ाने के लिए अधिक मानकीकरण और क्षेत्रों के बीच समन्वय की जरूरत है।
वेयरहाउस का विकास और यातायात के साथ तालमेल
रियल एस्टेट सलाहकार नाइट फ्रैंक इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत के आठ प्रमुख बाजारों में वेयरहाउस लेनदेन की मात्रा वित्त वर्ष 2024 में 5.64 करोड़ वर्ग फुट तक पहुंच गई। यह इन प्रमुख लॉजिस्टिक्स केंद्रों में मजबूत मांग को दर्शाता है। हालांकि, पहले और अंतिम पड़ाव की परिवहन क्षमता की ग्रोथ इसके साथ पूरी तरह से तालमेल नहीं रख पा रही। इसका केवल एक कारण है छोटे और ग्रामीण फ्लीट ऑपरेटरों के लिए कर्ज की सीमित उपलब्धता। जैसे-जैसे माल ढुलाई इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ रहा है, टियर 2 और टियर 3 बाजारों से व्यापक भागीदारी को सक्षम करने के लिए किफायती और टिकाउ सीवी फाइनेंसिंग सुनिश्चित करना आवश्यक हो गया है। इस कर्ज के अंतर को पाटना ही भारत के आधुनिक वेयरहाउस नेटवर्क के मूल्य को अधिकतम स्तर तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करना है।
जैसे-जैसे भारत विशाल स्टोरेज और वितरण बुनियादी ढांचा बना रहा है, उसे इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि इन स्थानों से माल की आवाजाही को कैसे फाइनेंस किया जाए। ट्रांसपोर्ट के लिए आसानी से कर्ज उपलब्ध कराए बगैर, इस आधुनिक क्षमता का अधिकांश हिस्सा उपयोगी नहीं रहेगा।
वृद्धि का अवसर और भविष्य की चुनौतियां
एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सीवी फाइनेंसिंग बाजार के काफी आगे बढ़ने की उम्मीद है। यह भारत सहित देशों में फाइनेंसिंग सॉल्यूशन की मजबूत मांग को दर्शाता है। यह रुझान एक अहम सच्चाई को सामने लाता है। फाइनेंसिंग केवल सहयोगी कार्य भर नहीं है। यह माल ढुलाई में वृद्धि, मानकीकरण और प्रतिस्पर्धी बनाए रखने का प्रमुख किरदार है। इमार्क (IMARC) के अनुसार, भारत का लॉजिस्टिक्स बाजार 2024 में 228.4 अरब अमेरिकी डॉलर का था और 2033 तक यह 428.7 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यानी यह 6.5% की सीएजीआर से बढ़ रहा है। जैसे-जैसे यह ग्रोथ की यह तस्वीर सामने आती है, सीवी फाइनेंसिंग की भूमिका एक परिचालन सहयोग से कहीं आगे बढ़कर एक रणनीतिक जरूरत में बदल जाएगी।
हालांकि, जैसे-जैसे यह क्षेत्र परिपक्व होता है, इसे भरती चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। डिजिटल कर्ज के नियमों में सख्ती, को लेंडिंग और फर्स्ट लॉस डिफॉल्ट गारंटी (एफएलडीजी) संरचनाओं पर अधिक जांच और बदलते पूंजी पर्याप्तता जरूरतें, कर्ज देने वालों के कर्ज मूल्य निर्धारण और संरचना को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा, शहरी सीवी बाजारों में मांग कम होने से मार्जिन को कम कर सकती है। वित्तदाताओं को अधिक अस्थिर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर रुख करने के लिए प्रेरित कर सकती है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा आधारित मूल्यांकन,अनुकूल उत्पाद डिजाइन,नीति, टेक्नोलॉजी और वित्तीय संस्थानों के बीच लगातार की आवश्यकता होगी। भारत को अपनी लॉजिस्टिक्स क्रांति का भरपूर दोहन करने के लिए कर्ज को उतना ही गतिशील, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार बनाना होगा, जितना कि वह सड़कों और नेटवर्क को गति देता है।
