रेत माफिया पर निर्णायक प्रहार की जरूरत

नदियों से अवैध रेत खनन अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि पर्यावरण और शासन की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल बन चुका है. नर्मदा, सोन और चंबल जैसी नदियों में जिस तरह रेत माफिया सक्रिय है, उससे साफ है कि बिना प्रशासनिक मिलीभगत के इतना बड़ा अवैध कारोबार संभव नहीं.

जबलपुर, धार, खरगोन, खंडवा, बड़वानी और नर्मदा के किनारे बसे अन्य जिलों की स्थिति बेहद चिंताजनक है.दरअसल, सोन नदी के प्रतिबंधित क्षेत्रों में भी माफिया बेखौफ सक्रिय है. हाल ही में रामपुर नैकिन क्षेत्र में सशस्त्र बल के साथ की गई कार्रवाई में नौ हाईवा वाहन जब्त किए गए. यह दिखाता है कि प्रशासन चाहे तो कार्रवाई संभव है. संजय टाइगर रिजर्व और अन्य अभयारण्यों के अधिकारियों की संयुक्त कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन ऐसी पहलें नियमित क्यों नहीं बन पातीं, यह चिंता का विषय है. इधर, चंबल क्षेत्र में अवैध खनन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नाराजगी ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है. न्यायालय ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अवैध खनन पर रोक नहीं लगी तो जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होगी. यह केवल प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि पूरे तंत्र के लिए एक सख्त संदेश है. मुरैना में एसएएफ जवानों की तैनाती और निगरानी के लिए कैमरे लगाने की पहल सही दिशा में कदम है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं.

दरअसल समस्या यह है कि रेत माफिया एक संगठित नेटवर्क के रूप में काम करता है, जिसमें स्थानीय स्तर से लेकर उच्च स्तर तक की मिलीभगत शामिल होती है. जब तक इस पूरे नेटवर्क को तोडऩे के लिए ठोस और निरंतर रणनीति नहीं बनाई जाएगी, तब तक छिटपुट कार्रवाइयों से कोई बड़ा बदलाव नहीं आएगा.

अवैध खनन का असर केवल कानून तक सीमित नहीं रहता. इससे नदियों का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, जलस्तर गिरता है और पर्यावरण को गहरा नुकसान होता है. नर्मदा और चंबल जैसी नदियां करोड़ों लोगों की जीवनरेखा हैं, जिनका संरक्षण अनिवार्य है.

सरकार को चाहिए कि रेत खनन के लिए पारदर्शी व्यवस्था लागू करे और तकनीक का उपयोग बढ़ाए. साथ ही, अवैध खनन में शामिल किसी भी व्यक्ति,चाहे वह अधिकारी हो या जनप्रतिनिधि, सभी पर सख्त कार्रवाई हो.

सरकार को चाहिए कि वह रेत खनन के लिए पारदर्शी और सख्त नीति लागू करे. ई-टेंडरिंग, जीपीएस ट्रैकिंग और रियल-टाइम मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए. साथ ही, अवैध खनन में लिप्त पाए जाने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भी बिना किसी दबाव के कार्रवाई हो. केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देने से समस्या का समाधान नहीं होगा. दरअसल, अब समय आ गया है कि रेत माफिया के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जाए, वरना नदियों के साथ-साथ शासन की साख भी खतरे में पड़ जाएगी. सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी को अंतिम संकेत मानते हुए यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो जीवनदायिनी नदियां पूरी तरह से तबाह हो जाएंगी. रेत माफिया का नाश केवल कानून लागू करने का सवाल नहीं, बल्कि भविष्य बचाने की अनिवार्यता भी है.

 

 

 

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