
( जितेंद्र पुरोहित ) देवास । लंबे इंतजार और गुटबाजी के बीच आखिरकार कांग्रेस आलाकमान ने देवास शहर और ग्रामीण जिलाध्यक्ष के नामों का ऐलान कर दिया है। जैसे ही आदेश आया, वैसे ही देवास की सियासत में हलचल तेज हो गई। राजनीतिक विश्लेषकों से लेकर आम कार्यकर्ताओं तक में चर्चा का दौर शुरू हो गया है।
अब तक शहर कांग्रेस की कमान मनोज राजानी के हाथों में थी, लेकिन आलाकमान ने उन्हें हटाकर प्रयास गौतम को यह जिम्मेदारी सौंपी है। वहीं ग्रामीण जिलाध्यक्ष के पद पर मनीष चौधरी को चुना गया है।
घोषणा के बाद कांग्रेस खेमे में मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। एक ओर दबे-छुपे कार्यकर्ताओं के बीच खुशी की लहर दौड़ गई है, तो दूसरी ओर मनोज राजानी समर्थक और खासकर सज्जन वर्मा गुट के लोग इस फैसले से हताश बताए जा रहे हैं। इस नियुक्ति के बाद कार्यकर्ताओं की टिप्पणी भी दिलचस्प रही “कल ही देश आजाद हुआ था, और आज सज्जन मुक्त जिला हो गया।”
यह बयान साफ करता है कि बदलाव सिर्फ संगठनात्मक नहीं बल्कि गुटबाजी की जड़ों तक असर डालने वाला है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और बदलाव का कारण-
मनोज राजानी के कार्यकाल में कांग्रेस की हालत बदतर हो गई थी। जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि अन्य स्थानीय चुनावों में भी कांग्रेस का सुपड़ा साफ हो गया। लगातार पराजय से संगठन में असंतोष बढ़ रहा था और लंबे समय से नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठ रही थी।
सियासी जानकारों का मानना है कि आलाकमान ने यह कदम 2028 की विधानसभा और 2029 की लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर उठाया है। संगठन को नई ऊर्जा और युवा नेतृत्व देने के लिए यह बदलाव बेहद जरूरी था।
गुटबाजी पर लगेगी लगाम?
देवास कांग्रेस का सबसे बड़ा दर्द गुटबाजी रही है। जिले में सज्जन वर्मा और अन्य नेताओं के खेमों में बंटी कांग्रेस बार-बार चुनावी जंग हारती आई है। पहले चर्चा थी कि शहर में फिर से मनोज राजानी और ग्रामीण में बंटू गुर्जर की ताजपोशी होगी, लेकिन अंतिम क्षणों में समीकरण बदल गए और आलाकमान ने अप्रत्याशित रूप से नए नामों पर मुहर लगा दी।
अब देखना होगा कि प्रयास गौतम और मनीष चौधरी बिखरी कांग्रेस को एकजुट कर पाएंगे या नहीं।
आगे की राह कठिन-
संगठन में ताजपोशी तो हो गई है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होगी। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना, बूथ स्तर तक नई टीम बनाना और गुटबाजी को खत्म करना आसान नहीं होगा। यदि नए अध्यक्ष इन चुनौतियों को साध लेते हैं, तो कांग्रेस को भविष्य में मजबूती मिल सकती है। वरना यह बदलाव भी सिर्फ नाम का साबित होगा।
