ग्वालियर: एमआईटीएस डीम्ड यूनिवर्सिटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग द्वारा आयोजित स्पेस वीक के उद्घाटन समारोह में छात्रों को अंतरिक्ष विज्ञान की गहराई से जानकारी मिली। इसरो वैज्ञानिक अखिलेश शर्मा ने छात्रों के सवालों के जवाब देते हुए अंतरिक्ष मिशनों की चुनौतियों और फायदों पर प्रकाश डाला।छात्र ओशियन अग्रवाल के सैटेलाइट टकराव संबंधी प्रश्न पर शर्मा ने बताया कि इंटरनेशनल टेलीकम्यूनिकेशन यूनिट देशों को तय ऑर्बिट आवंटित करती है।
श्रेया गोयल के सवाल पर उन्होंने कहा कि मिशन बाद सैटेलाइट को या तो 40,000 किमी दूर ग्रेवयार्ड ऑर्बिट भेजा जाता है या पृथ्वी के निचले ऑर्बिट में लाकर जलाया जाता है। राघव सिंह के अंतरिक्ष कचरे पर सवाल पर उन्होंने ‘डेब्रिस मैनेजमेंट’ तकनीकों का जिक्र किया।उन्होंने स्टारलिंक प्रोजेक्ट, क्रायोजेनिक इंजन और मैकेनिकल इंजीनियरिंग की अहम भूमिका भी समझाई।
आम जीवन पर अंतरिक्ष मिशनों के प्रभाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि सटीक मौसम पूर्वानुमान, नेविगेशन और हाई-स्पीड इंटरनेट सैटेलाइट तकनीक की देन हैं।जनसंपर्क अधिकारी मुकेश मौर्य ने बताया कि कार्यक्रम में डॉ. मनीष सागर, डॉ. मनोज गौर, डॉ. चन्द्र शेखर मालवी और डॉ. नितिन उपाध्याय मौजूद थे। आयोजन एरोस्पेस क्लब द्वारा किया गया।
