सुप्रीम कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले पर फिर सुनवाई करेगा

नयी दिल्ली, 07 अगस्त (वार्ता) उच्चतम न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार के एक विवादित फैसले पर शुक्रवार को फिर से सुनवायी करेगा।

शीर्ष अदालत ने एक दीवानी विवाद में हैरानी जताते हुए न्यायमूर्ति कुमार से उनकी सेवानिवृत्ति तक उनसे आपराधिक मामले वापस लेने का आदेश दिया था।

न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ शिखर केमिकल्स द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका पर विचार करेगी।

उच्चतम न्यायालय ने हालांकि, पहले ही इस मामले का निपटारा कर दिया था।

पीठ ने अपने चार अगस्त के आदेश में उच्च न्यायालय के एकल पीठ के न्यायाधीश के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि संबंधित न्यायाधीश ने न केवल खुद बदनाम हुये, बल्कि न्याय का भी मजाक उड़ाया है।

पीठ ने कहा, “हम यह समझने में असमर्थ हैं कि उच्च न्यायालय स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है। कई बार हम यह सोचकर हैरान रह जाते हैं कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी विचार से पारित किए जाते हैं या यह कानून की सरासर अज्ञानता है। जो भी हो, ऐसे बेतुके और गलत आदेश पारित करना अक्षम्य है।”

उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति कुमार ने 05 मई, 2025 के एक आदेश द्वारा कानपुर नगर के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-एक की अदालत में अभियुक्त मेसर्स शिखर केमिकल्स को आपूर्ति किए गए सामान के बकाया भुगतान के लिए लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी थी।

न्यायाधीश ने इसे उचित ठहराते हुए कहा कि शिकायतकर्ता को दीवानी मुकदमा दायर करके शेष राशि वसूलने में काफी समय लग सकता है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा, “यह आदेश इस न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में हमारे कार्यकाल में अब तक देखे गए सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से एक है।”

शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से संबंधित न्यायाधीश से वर्तमान आपराधिक निर्णय तुरंत वापस लेने का अनुरोध किया था। अदालत ने आगे निर्देश दिया कि संबंधित न्यायाधीश को उनके पद छोड़ने तक कोई आपराधिक निर्णय नहीं सौंपा जाएगा।

पीठ ने कहा, “यदि किसी समय उन्हें एकल न्यायाधीश के रूप में जिम्मेवारी दी भी जाती है, तो उन्हें कोई आपराधिक निर्णय नहीं सौंपा जाएगा।”

उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि वह यह निर्देश जारी करने के लिए बाध्य है, क्योंकि उसे ध्यान में है कि वर्तमान आदेश संबंधित न्यायाधीश का एकमात्र गलत आदेश नहीं है जिस पर उसने पहली बार गौर किया है।
पीठ ने कहा, “हमने पिछले कुछ समय में ऐसे कई गलत आदेशों पर गौर किया है।”

 

 

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