नई दिल्ली, (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने आज अपने एक ऐतिहासिक फैसले में हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा के निरंतर उपयोग की निंदा की और इसे अमानवीय और संविधान द्वारा प्रदत्त गरिमा के अधिकार का उल्लंघन बताया।
न्यायालय ने कहा कि इस तरह के शारीरिक श्रम, जिसमें एक इंसान दूसरे इंसान को खींचता है, को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए, खासकर आजादी के 78 साल और संविधान के 75 साल बाद।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई, न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने महाराष्ट्र के पर्यावरण के प्रति संवेदनशील पहाड़ी शहर माथेरान में चल रही ई-रिक्शा पायलट परियोजना से संबंधित मुद्दों पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए।
न्यायालय ने कहा कि गरीबी और विकल्पों के अभाव के कारण लोग इस अमानवीय श्रम को अपनाने के लिए मजबूर हैं। पीठ ने इस बात पर ज़ोर देते हुए कहा कि ऐसी प्रथाएँ सामाजिक और आर्थिक न्याय के संवैधानिक आदर्शों के साथ विश्वासघात करती हैं।
पीठ ने टिप्पणी की, “ऐसी प्रथा की अनुमति देना, जो भारत जैसे देश में मानवीय गरिमा की मूल अवधारणा के विरुद्ध है, सामाजिक और आर्थिक न्याय के संवैधानिक वादों का अनादर करती है।”
