
(भारत राय) छिंदवाड़ा। केंद्र की मोदी और प्रदेश की मोहन सरकार द्वारा संचालित विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ जिले के कई जनप्रतिनिधियों और प्रभावशाली लोगों ने उठाया है। परंतु जब बात इन योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही की आती है, तब वही लोग सार्वजनिक संवाद से बचते दिखाई दे रहे हैं।
वर्तमान में सरकार द्वारा प्रधानमंत्री आवास, किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, लाड़ली बहना जैसी योजना संचालित की जा रही है, जिसका लाभ एक आम हितग्राही से लेकर योजना के दायरे में आने वाले कथित जनप्रतिनिधी तक उठा रहे हैं। देखने में तो यहां तक आ रहा है की शासकीय महकमें में सरकारी नुमाइंदे पात्र और जरूरतमंद हितग्राहियों को शासन की योजना का लाभ दिलाने से परे कथित जनता के चूने हुए ताकत वर और आर्थिक रूप से सक्षम लोगों को योजना का लाभ दिलाने से परहेज नहीं कर रहे हैं। जिले की आठ सौ से अधिक ग्राम पंचायत और 11जनपद क्षेत्रों की बात की जाए तो अधिकांश शासकीय कार्यालय में शासन द्वारा संचालित योजनाओं और लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक नहीं की गई है, जिससे आम जनता यह जान ही नहीं पाती कि किसे लाभ मिला और किसे नहीं?
सूचना पटल पर सूची सार्वजनिक करने की मांग
शासन की गाइडलाइन और योजनाओं में किए गए प्रावधानों की बात की जाए तो सभी सार्वजनिक और शासकीय कार्यालय में योजना से जुड़ी जानकारी और उनसे लाभान्वित होने वाले हितग्राहियों की सूची के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित कार्यस्थल पर सूचना पटल होना आवश्यक है। लेकिन यह जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के लिए यह जांच का विषय है की सूचना पटल का खर्च केवल फाइलो तक सीमित है। जिसकी बारीकी से जांच की जाए तो करोड़ो का घोटाला सामने आ जाएगा।
स्थानीय समाजसेवी रिंकू रितेश चौरसिया का कहना है,जिन्होंने इन योजनाओं का लाभ ले लिया है, उनकी सूची ग्राम पंचायत, वार्ड कार्यालय और नगर पालिका के सूचना पटल पर चस्पा की जानी चाहिए। यह जनता का अधिकार है कि वह देख सके किसे किस योजना का लाभ मिला।
प्रधानमंत्री आवास योजना में नाम, नहीं पहचान प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत बने घरों पर योजना का नाम, वर्ष और लाभार्थी का नाम स्पष्ट रूप से लिखा जाना चाहिए, ताकि यह प्रमाणित हो सके कि वह आवास सरकारी योजना के अंतर्गत मिला है। लेकिन जिले के कई घरों में ऐसा कोई संकेत तक नहीं है। अब सवाल उठता है की जब सरकारी पैसे से घर मिला है, तो फिर छुपाने की क्या बात है? जिन अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों की निगरानी में ये योजनाएं लागू की गईं, यदि उन्होंने सार्वजनिक सूचना के नियमों का पालन नहीं किया है, तो उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
