रायसेन: आधुनिकता के प्रवाह में सारा परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। इसके साथ ही बदल रहा है लोगों की सोच, पुरानी परंपराएं, मान्यताएं और बहुरंगी समृद्ध लोकजीवन। यही वजह है कि गांवों और शहरों में सावन के झूले गुजरे जमाने की बात हो गए हैं। क्योंकि शहरों के विकास के चलते लोगों ने पेड़ काट डाले। कुएं भी पाट दिए गए। इससे अब शहरों व ग्रामीण इलाकों में न तो कहीं झूले दिखाई देते हैं और न ही सावन गीत गातीं युवतियां। सावन माह समाप्त होने में अब कुछ दिन ही शेष है, मगर अभी भी वातावरण में उमस है। चार-पांच दशक पहले ऐसा नहीं था।
सावन के महीने में ठंडी रिमझिम फुहारों और चारों तरफ हरियाली देखकर लोगों का तन मन भीग जाता था ।लेकिन अब पहले जैसा मौसम नहीं रहा, वातावरण में बदलाव आ गया है।अब न तो समय से बारिश होती है और न ही कहीं झूले नजर आते हैं। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में शाम के समय युवतियां व महिलाएं झूले के पास एकत्र होकर सावन गीत के साथ झूला झूलती थीं और एक दूसरे से ऊंचा पेंग बढ़ाने की होड़ लगती थीं। समय बदलने के साथ आधुनिकता की आंधी में यह सब कुछ लुप्त हो गया। सावन मास समाप्त होने को है लेकिन न कहीं सावन गीत सुनाई दे रहे हैं और न ही पेड़ों की डालों पर झूले नजर आ रहे हैं।
गायब हो गए बड़े नीम के पेड़ औऱ झूले.
हरे भरे जंगल, पहाड़ों, प्राकृतिक झरनों और अपने शीतल मौसम के कारण ही सुविख्यात रहा रायसेन जिला समय बीतने के साथ ही अब न तो हरा भरा दिखाई दे रहा है और न ही वह शीतल मौसम अब नजर आ रहा है। बुजुर्गों का कहना है कि सावन के महीने में अपने मायके आई युवतियां, किशोरियां और बच्चे इन झूलों पर जगह-जगह झूलते नजर आती थीं। जहां महिलाएं सावन के गीतों एवं खड़ी भाषा के गीतों पर ढोलक के थाप पर नाचती एवं गाती थीं।अब ना वह बड़े नीम के पेड़ रहे और ना झूले नजर आते।
बदल गई दिनचर्या
वह गांव का बचपन और सावन के झूले कहीं दादी नानी की कहानी ना बन जाएं ।बदलते जमाने के साथ अब लोगों की दिनचर्या ही बदल गई है
