मालेगांव 2008 बम विस्फोट मामले में एनआईए अदालत द्वारा हालिया निर्णय ने भारतीय राजनीति और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर कई अहम प्रश्न खड़े कर दिए हैं.अदालत ने सात में से चार आरोपियों को बरी कर दिया, और शेष तीन के विरुद्ध भी साक्ष्य गंभीर रूप से कमजोर बताए. यह फैसला न केवल 16 वर्षों से लंबित एक चर्चित मुकदमे का निष्कर्ष है, बल्कि उस ‘हिंदू आतंकवाद’ की राजनीतिक थ्योरी पर भी निर्णायक प्रहार करता है जिसे कभी प्रचारित किया था.
यह स्वीकार करना कठिन नहीं कि इस प्रकरण को लेकर शुरू से ही राजनीतिक रंग देने की कोशिश हुई. जांच एजेंसियों—चाहे वह महाराष्ट्र एटीएस रही हो या बाद में केस को संभालने वाली एनआईए—ने जिस तरह से कार्य किया, उसमें पेशेवर निष्पक्षता का अभाव दिखा. साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे आरोपियों को बिना ठोस साक्ष्यों के वर्षों तक जेल में रखा गया.यह न केवल उनके मौलिक अधिकारों का हनन था, बल्कि भारतीय न्याय प्रणाली की धीमी प्रक्रिया की भी एक त्रासद तस्वीर है.
इस फैसले के आलोक में हमें यह भी पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या आतंकवाद को धर्म के चश्मे से देखना न्यायोचित है. मालेगांव केस में जिस ‘भगवा आतंकवाद’ की अवधारणा को राजनीतिक और अन्य गलियारों में गुंजाया गया, वह अब न्यायिक कसौटी पर खारिज हो चुकी है. इससे पहले 2007 के समझौता एक्सप्रेस विस्फोट केस में भी यही देखा गया था, जहां पाकिस्तानी आतंकी संलिप्तता की बजाय भारत के कुछ संगठनों को बिना पर्याप्त साक्ष्यों के फंसाने का प्रयास हुआ था.
यह समय है जब हमारी जांच एजेंसियां राजनीतिक दबावों से मुक्त होकर, केवल साक्ष्य-आधारित और निष्पक्ष जांच की दिशा में स्वयं को पुनर्गठित करें. आतंकवाद, किसी भी धर्म, संप्रदाय या विचारधारा से ऊपर एक अपराध है, जिसे राजनीतिक हथियार न बनाया जाए.अंतत:, मालेगांव केस केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं, बल्कि भारत के लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी है कि राजनीतिक एजेंडा और जांच तंत्र की निष्पक्षता के बीच संतुलन बिगड़ते ही न्याय की आत्मा घायल होती है. हमें उस संतुलन की पुनर्स्थापना करनी होगी—अब, और बिना देर किए.बहरहाल, मालेगांव बम विस्फोट और उससे जुड़े अभियुक्तों की रिहाई ने भारतीय न्याय प्रणाली में निष्पक्षता और विवेक का प्रमाण तो प्रस्तुत किया है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर किया है कि राजनीतिक पूर्वग्रहों से प्रेरित जांच किस हद तक निर्दोष नागरिकों का जीवन बर्बाद कर सकती है.इस थ्योरी के चलते न केवल निर्दोषों को वर्षों तक जेल में रहना पड़ा, बल्कि राष्ट्रवादी संगठनों और विचारधाराओं को आतंकवाद से जोडऩे का असफल प्रयास किया गया. इससे समाज में अविश्वास, ध्रुवीकरण को बढ़ावा मिला. दरअसल,भारत जैसे विविधताओं वाले लोकतंत्र में आतंकवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे को किसी धर्म, रंग या विचारधारा से जोडऩा न केवल खतरनाक है बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता के लिए विनाशकारी भी है. आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई केवल तभी सफल हो सकती है जब जांच, आरोप और सज़ा पूरी तरह से प्रमाण-आधारित, निष्पक्ष और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हो.मालेगांव मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक एजेंडा गढऩे के लिए “भगवा आतंकवाद” जैसा शब्दावली प्रयोग करना केवल तात्कालिक लाभ दे सकता है, दीर्घकालिक रूप से यह न्याय और सच्चाई की हार है.यह समय है जब देश एकजुट होकर आतंकवाद के विरुद्ध खड़ा हो, बिना किसी रंग, धर्म या पार्टी भेद के. जाहिर है आतंकवाद का धर्म नहीं होता.
