सीहोर. प्रशासन के तमाम निर्देशों और आदेशों को दरकिनार करते हुए मरीजों एवं गर्भवती महिलाओं को रेफर किए जाने का गोरखधंधा बदस्तूर चल रहा है. हैरत की बात यह है मरीज की जान को कई खतरे बताते हुए रेफर कर दिया जाता है. वो ही मरीज निजी नर्सिंग होम में सामान्य हो जाता है. यही कारण है कि जिला अस्पताल के मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य केन्द्र में गत 15 दिन में 180 प्रसूताएं एडमिट हुईं. इनमें से 45 की स्थिति क्रिटिकल बताकर उन्हें भोपाल अस्पताल के नाम पर रेफर कर दिया गया.
जिला प्रशासन मातृ-शिशु मृत्युदर कम करने के लिए तरह-तरह के जतन कर रहा है, लेकिन जिला अस्पताल में सुविधाएं बढऩे के बाद भी अव्यवस्थाएं कम नहीं हो रही हैं. स्थिति यह है कि 300 बेड के अस्पताल में अब भी प्रसूताओं के लिए पर्याप्त जगह नहीं है. प्रसव के बाद एक पलंग पर दो-दो प्रसूताओं को सुलाया जा रहा है. ऐसे में प्रसूताओं के बच्चों को परिजन संभालते हैं. खास बात यह है कि यहां जो महिलाएं भर्ती हुई हैं, उनमें से अधिकांश महिलाओं की सीजर से ही डिलेवरी होती है. यही नहीं जो महिलाएं इसका विरोध करती हैं उन्हें क्रिटिकल बताकर रेफर कर दिया जाता है. पिछले 1 जुलाई से 15 जुलाई तक की बात करें तो इस दौरान जिला अस्पताल में कुल 180 प्रसूताएं प्रसव के लिए आई थीं. आश्चर्य की बात यह है कि इनमें से 45 प्रसूताओं को क्रिटिकल बताकर रैफर कर दिया गया था. रैफर करना तब नौटंकी साबित हुआ जब यहां से रैफर की गई प्रसूताओं की शहर के ही निजी अस्पतालों में नॉर्मल डिलेवरी हो गई. सवाल यह है कि जब निजी अस्पताल में नॉर्मल डिलेवरी हुई है तो उसे क्रिटिकल बताकर रैफर क्यों किया गया जाता है? इसकी गंभीरता से जांच होना चाहिए.
विशालकाय भवन में प्रसूताओं को जगह नहीं मिलती
जिला अस्पताल इन दिनों 300 बिस्तरों का है. ट्रामा सेंटर भवन 200 बिस्टरों का और जिला अस्पताल के नए भवन में 50 क्रिटिकल केयर कंटीशन बेड के साथ 100 बिस्तरों की सुविधा भी है. इसके बाद एक बिस्तर पर दो-दो प्रसूताओं को लिटाया जा रहा है. यह आश्चर्य की बात है।.ऐसे में प्रसूताओं को तो परेशानी हो रही रही है, साथ ही वे अपने नवजात बच्चों को भी नहीं संभाल पा रही हैं. जबकि प्रसव के बाद बच्चे को मां की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. मजबूरी में नवजात बच्चों को प्रसूता के परिजनों को संभालना पड़ रहा है.
कई वार्डों में पलंग पर बेडशीट तक नहीं
जिला अस्पताल के कई वार्ड ऐसे हैं जहां मरीजों के बिस्तर पर चादर तक नहीं है। ऐसे में मरीजों को अपने घर से चादर लाकर बिछाना पड़ती है। कई बार अस्पताल से उन्हें ग्रीन प्लास्टिक बिछाने के लिए दे दी जाती है, जिससे मरीजों को राहत की जगह और परेशानी होती है, लेकिन इसके बाद भी जिम्मेदार इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. इसके अलावा कई वार्डों में तो गद्दों का जूट तक बाहर झांकने लगा है.
गायनिक आईसीयू का निर्माण हो रहा
वर्तमान में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य विंग में रिनोवेशन का काम चल रहा है. उसमें गायनिक आईसीयू का निर्माण होने के साथ ही हम क्रिटिकल केस आसानी से हैंडल कर सकेंगे. दो माह में गभर्वती महिलाओं को रेफर करने की संख्या पूरी तरह समाप्त हो जाएगी.
डॉ. प्रवीर गुप्ता,
सिविल सर्जन
