पत्थर के नीचे से निकलते हैं बिच्छू, लेकिन काटते नहीं…

नलखेड़ा।गुरुपूर्णिमा के अवसर पर गुरुवार को चमत्कारिक प्राचीन श्री बल्डावदा हनुमान मंदिर पर भक्तों का तांता लगा रहेगा. मंदिर नगर से दो किमी दूर पूर्व दिशा में एक ऊंची बल्डी पर स्थित है, जो नगर तथा आसपास के क्षेत्रों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र है. इस विशेष दिन पर श्री हनुमानजी का आकर्षक श्रृंगार कर हवन पूजन, अनुष्ठान होंगे तथा दर्शन के लिए भक्त आएंगे. इस मौके पर महाप्रसादी का वितरण भी किया जाएगा.

प्राचीन मान्यता के अनुसार मंदिर में विराजित श्री बल्डावदा हनुमानजी द्वापरयुगीन है, जो कि मंदिर में बैठी हुई मुद्रा में स्थित है. हनुमान जी की मूर्ति स्वयंभू है. इस विशाल मूर्ति की एक विशेषता यह भी है कि हनुमान जी की इस मूर्ति को दाएं या बाएं किसी भी तरफ से देखे तो ऐसा लगता है जैसे मानो भगवान भक्त को देख रहे हों. वर्षों पूर्व पुरातत्ववेत्ताओं के नलखेड़ा आगमन पर उनके द्वारा इस बल्डी का भी अवलोकन किया गया था, तब निष्कर्ष निकाला गया था कि इस पहाड़ी के नीचे खोखली जगह है व यहां लगे शिलालेखों के आधार पर यह मूर्ति पांडवकालीन समय की हो सकती है.

पत्थरों के नीचे से निकलते हैं बिच्छू

यह चमत्कारिक स्थल जिस बल्डी पर स्थित है, उस पर अधिकांश पत्थरों के नीचे से बिच्छू निकलते रहते हैं, लेकिन वर्षभर में केवल गुरुपूर्णिमा के दिन पत्थरों के नीचे से निकलने वाले बिच्छू किसी को भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं. इस पौराणिक स्थल की महत्ता को देखते हुए यहां पर जनसहयोग और नगर परिषद द्वारा अनेक विकास कार्य करवाएं हैं. सौंदर्यीकरण के तहत पौधारोपण से यह बल्डी हरियाली में तब्दील हो चुकी है. यहां का दृश्य अलौकिक और मनोहारी दिखाई देता है.

प्राकृतिक सौंदर्य की छटा बिखेर रही पहाड़ी

इस पौराणिक स्थल पर पर्यटन विभाग द्वारा सौंदर्यीकरण करवाए जाने के बाद यह मंदिर आकर्षक व भव्य हो गया है. पहाड़ी पर पौधारोपण के बाद वर्षाकाल में यह स्थल अपनी अनुपम प्राकृतिक छटा बिखेर रहा है. सायंकाल के समय डूबते सूर्य की किरणें जब इस पहाड़ी पर गिरती हैं तो यह दृश्य मनमोहक होकरअलौकिक दिखाई देता है. जिसे निहारने के लिए लोग यहां बड़ी संख्या मेंआते हैं.

 

सैकड़ों वर्षों से चली आ रही मेले की परंपरा

 

इस मंदिर को लेकर यह भी प्रमाण मिलता है कि जब राजा नल विपत्तियों में थे तो भगवान श्रीकृष्ण ने अवंतिका नगरी से 40 कोस दूर पूर्व दिशा की ओर लक्ष्मणा नदी के किनारे स्थित मां बगलामुखी की आराधना करने का परामर्श दिया था. राजा ने अपना मुख्य स्थान श्री बल्ड़ावदा हनुमान मंदिर एवं मां बगलामुखी मंदिर के मध्य रखा था. राजा नल तब प्रतिदिन दोनों स्थानों का साधना करते थे. इसी स्थान पर मेले की परंपरा सैकड़ों वर्ष से चली आ रही है. भक्तों की मान्यता है कि जो भी मन्नात यहा मांगी जाती है वह अवश्य पूरी होती है. प्रचलित किंवदंतियों को ध्यान में रखते हुए कुछ लोगों द्वारा इस स्थान पर खुदाई कर धन निकालने का प्रयास भी किया गया लेकिन कोई भी इस कार्य में सफल नहीं हो पाया. यहां तक कि खुदाई कार्य भी नहीं कर पाया.

 

पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल

 

श्री बल्डावदा हनुमान मंदिर के बारे में किं वंदती है कि नलखेड़ा नगर पहले मंदिर के समीप ही स्थित था, परंतु प्राकृतिक आपदा आने के कारण यहां बसा नगर जमींदोज हो गया था और फिर कालांतर में नगर यहां से दो किमी दूर स्थापित किया गया. बुजुर्गों के अनुसार यह मंदिर किसी ऊंचे स्थान पर स्थित था, इसलिए मंदिर का ऊपरी हिस्सा शेष रह गया. इस बात का प्रमाण इससे भी मिलता है कि बल्डी पर यदि कोई भारी वस्तु गिराई जाए तो धम्म सी आवाज आती है जो कि किसी खोखले स्थान पर आने वाली आवाज जैसी होती है. उक्त स्थान से पुरातत्व खुदाई के समय कई मुद्राएं एवं पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण वस्तुएं भी पूर्व में निकल चुकी हैं जो कि पुरातत्व विभाग के पास आज भी रखी हुई है. नगर के बुजुर्ग जन बताते हैं कि बल्ड़ावदा गांव के नाम से विख्यात मंदिर में द्वापरकालीन विशालकाय मूर्ति प्रतिष्ठित है. हनुमानजी की प्रतिमाएं इसी आकर व स्वरूप में प्रतिष्ठित की जाती थी.

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