
विदिशा (सचिन तिवारी) रंगों के पांच दिन चलने वाले त्योहार होली के पर्व को अलग-अलग जगहों पर अलग अंदाज और परंपरायों के साथ मनाया जाता है जिस परिवार में गमी होती है उस घर में फाग का रंग डालने के बाद ही मांगलिक कार्यक्रम शुरु होते है.आज पंचमी के बाद अनरय खत्म होकर शुभ काम शुरू होते हैं।
जिले की अनेक समाजों में यह रिवाज परंपरागत है जब घर का कोई बुजुर्ग दिवंगत हो जाता है तो पहली होली पर दिवंगत के परिजनों को फाग का रंग डाला जाता है तथा समधी नृत्यांगनायें लेकर आते हैं रात भर नाच गाने होते हैं रिश्तेदार जुडते हैं सभी रिश्तेदार दिवंगत के परिजनों पर फाग का पानी डालते हैं पहली फाग के इस आयोजन के बाद परिवार में मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं.
चतुर्वर्णीय कार्यक्रम शास्त्रीय परंपरा के अनुसार
शुद्र वर्ण की देवी होलिका दहन के बाद होली की अग्नि को घर लाकर गोवर से बनीं मलरियों में रख कर अग्नि प्रज्वलित की जाती है तथा नए गेंहू के आटे की बाटी (गांकरें) बनाई जाती हैं. पूर्व के समय में हरयारे बाल्मीक समाज की महिलाओं के घर बनीं गांकरों की चुराते थे तथा बाल्मीक समाज की महिलाएँ हुरियारों को डंडों से पीटा करती थीं. बाल्मीक समाज के लोग अनरय वाले घरों में जाकर फाग का रंग डालते थे कुछ जगह पर यह परंपरा आज भी कायम है.
वाल्मीकी समाज के लोग टिमकी ,ढपली बजाते तथा फाग गाते हुए अनरय बाले घरों में जाते हैं.
सबसे पहले सफाईकर्मी को तिलक
सबसे पहले सफाई कर्मी को तिलक किया जाता है तथा गांव के सफाई कर्मी को नए कपडों सहित भोजन और पकवान दिए जाते थे बुजुर्गों की मृत्यु के बाद, कुछ समाजों में राई फाग मनाई जाती है. सामान्य मृत्यु बाले घर लोग फाग का रंग और नृत्यांगनाओं को लेकर गांव के अनरय बाले सभी घरों पर राई नृत्य करते हुए फाग का रंग डालते हैं और फाग का रंग डलने के बाद अनरय बाले घरों में शुभ कार्य शुरू हो जाते हैं.
मंदिर में नृत्य से होती है उत्सव की शुरूआत
नटेरन तहसील के समीप स्थित ग्राम रिनियां के स्व.राम नारायण, शिव नारायण एवं सुंदरलाल तिवारी की माताजी के स्वर्गवास हो जाने के बाद पहली होली पर उनके समधि ग्राम देव खजूरी निवासी सतनारायण दुबे रिश्ते नातेदारों के साथ नृत्यांगनाओं को लेकर रिनियां गांव पहुंचे मंदिर में बधाई गीत एवं नृत्य के बाद गांव के सभी अनरय के घरों में परिजनों को होली का रंग डालकर फाग उत्सव मनाया।
