संगोष्ठी: स्वतंत्र भारत के प्रथम बलिदानी थे डॉ मुखर्जी

ग्वालियर : डॉ. मुखर्जी का मानना था कि भारत की एकता से कोई समझौता नहीं हो सकता और उन्होंने ‘‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’’ का नारा देकर राष्ट्रीय एकता की आधारशिला को मजबूत किया। यह बात सोमवार को बाल भवन में डा श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर केंद्रित संगोष्ठी में भाजपा प्रदेश महामंत्री भगवान सबनानी ने कही।

उन्होंने कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक असाधारण दूरदृष्टि वाले राष्ट्रवादी नेता थे, वह शिक्षाविद और भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने कहा कि डॉ मुखर्जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति बने और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किए। सबनानी ने कहा कि स्वतंत्र भारत में बनी नेहरू सरकार में डॉ मुखर्जी प्रथम उद्योग और आपूर्ति मंत्री बने।

उन्होंने भारत के औद्योगिक विकास की नींव रखी, चित्तरंजन लोकोमोटिव फैक्ट्री जैसी संस्थाओं की स्थापना की और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को ‘‘संसद का शेर’’ भी कहा जाता था।उन्होंने संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू की तुष्टिकरण की नीतियों का विरोध करते हुए 19 अप्रैल 1950 को नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

इसके अलावा वह जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के भी खिलाफ थे। उन्होंने कहा कि डॉ मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरु गोलवलकर से मिलकर 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में जनसंघ की स्थापना की।सबनानी ने कहा कि डॉ. मुखर्जी ने ‘‘एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे’’ का नारा दिया और जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिए संघर्ष किया।

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