तमिलनाडु के बाद महाराष्ट्र में जिस तरह से हिंदी भाषा के खिलाफ विरोध की सियासत तेज़ हुई है, वह न केवल चिंताजनक है, बल्कि देश की भाषिक एकता और सामाजिक सौहार्द के लिए भी एक गंभीर खतरे की घंटी है. त्रिभाषा फॉर्मूले के बहाने, जिस तरह मराठी अस्मिता के नाम पर हिंदी को “थोपा गया” बताकर विरोध किया जा रहा है, वह तर्क से अधिक राजनीतिक मजबूरी की उपज प्रतीत होती है.
यह विरोध उस राज्य में हो रहा है जिसकी राजधानी मुंबई हिंदी सिनेमा का केंद्र है, जहां लाखों लोग हिंदी बोलते, समझते और लिखते हैं. यही नहीं, महाराष्ट्र के शिक्षा ढांचे में हिंदी की उपस्थिति कोई नई बात नहीं है. ऐसे में सवाल उठता है कि अचानक हिंदी विरोध क्यों और किसके
लिए ? इसकी पृष्ठभूमि में देखें तो यह राजनीतिक दलों की खोई हुई ज़मीन को फिर से पाने की रणनीति दिखती है. शिवसेना (उद्धव गुट) और मनसे के लिए “मराठी अस्मिता” एक भावनात्मक तुरुप का पत्ता रहा है, लेकिन जब यह अस्मिता किसी दूसरी भारतीय भाषा के खिलाफ खड़ी की जाती है, तब यह विचार मराठी संस्कृति का नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति का प्रतीक बन जाता है. यह विडंबना ही है कि जो नेता कल तक नई शिक्षा नीति को समर्थन दे रहे थे, वही आज उसके खिलाफ प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं.
त्रिभाषा फॉर्मूला देश में भाषाई समरसता को बढ़ावा देने की मंशा से लाया गया था.मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और वैश्विक भाषा को समन्वित करने की एक नीति. लेकिन इसमें भी हिंदी की जगह अन्य भारतीय भाषा चुनने का विकल्प सरकार ने दिया है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इसे “थोपना” नहीं कहा जा सकता. बावजूद इसके, हिंदी विरोध की राजनीति यह संकेत देती है कि मुद्दा भाषा नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति है.
भाषाएं जोडऩे का कार्य करती हैं, तोडऩे का नहीं.दुर्भाग्य से, भारत में राजनीतिक लाभ के लिए भाषाओं को भी खेमों में बांटने की परंपरा बनती जा रही है. जो दल अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों का विरोध नहीं करते, वे भारतीय भाषाओं को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा कर रहे हैं, यह एक विडंबना है और राष्ट्रीय एकता के लिए गंभीर चुनौती भी.
इस समय आवश्यकता है एक संतुलित दृष्टिकोण की.हिंदी, मराठी, तमिल, तेलुगु — हर भाषा हमारी साझी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. इन्हें एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना नहीं, बल्कि साथ लेकर चलना ही भारत की मूल आत्मा है.भाषाएं संस्कृति का आधार हैं, लेकिन जब वे राजनीति का औजार बन जाती हैं, तो केवल संस्कृति ही नहीं, देश भी घायल होता है.बहरहाल,
महाराष्ट्र में गैर-मराठी भाषी लोगों की संख्या और प्रतिशत अलग-अलग स्रोतों और अनुमानों के आधार पर भिन्न हो सकती है, लेकिन 2011 की जनगणना के आंकड़ों से कुछ स्पष्ट जानकारी मिलती है.
2011 की जनगणना के अनुसार, महाराष्ट्र की कुल जनसंख्या में से लगभग 69.93 फीसदी लोगों की मातृभाषा मराठी थी. इसका मतलब है कि लगभग 30.07 फीसदी आबादी गैर-मराठी भाषी थी.
मुंबई जैसे बड़े शहरी क्षेत्रों में गैर-मराठी भाषी आबादी का प्रतिशत राज्य के औसत से अधिक हो सकता है. कुछ रिपोर्टों में मुंबई में 40 फीसदी मराठी भाषी और 60 फीसदी गैर-मराठी भाषी होने का भी उल्लेख है, जिसमें हिंदी बोलने वाले सबसे बड़े समूह हैं.
जागरूक नागरिकों को इस खेल को पहचानना होगा और भाषाई सद्भाव की उस विरासत को संजोकर रखना होगा, जिसने भारत को विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण बनाया है.
