मुंबई, 30 जून (वार्ता) महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने कहा है कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं है, बल्कि एक क्षेत्र की भाषा है और इसलिए इसे अन्य राज्यों पर नहीं थोपा जा सकता है।
श्री ठाकरे ने विद्यालयों में प्रथम कक्षा से हिंदी पढ़ाने के सरकारी प्रस्ताव को वापस लेने की महायुति सरकार की घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सोमवार को यहां कहा, “ हिंदी राष्ट्रीय भाषा नहीं है, बल्कि एक क्षेत्र की भाषा है और इसलिए इसे अन्य राज्यों पर नहीं थोपा जा सकता।”
उन्होंने संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा, “उत्तर भारत से कई लोग काम के लिए महाराष्ट्र आते हैं। अगर ऐसा है, तो उनके राज्यों में मराठी पढ़ाई जानी चाहिए। महाराष्ट्र में मराठी के ऊपर हिंदी क्यों थोपी जा रही है? 3,000 साल पुरानी मराठी पर 150-200 साल पुरानी भाषा थोपने का यह प्रयास हमें स्वीकार्य नहीं है।” उन्होंने कहा कि हिंदी पढ़ाने की जिद उन्हें समझ में नहीं आती।
उन्होंने कहा, “पहले हिंदी कक्षा पांच या छह से पढ़ाई जाती थी और वह स्वीकार्य थी। लेकिन अब इसे प्रथम कक्षा से क्यों थोपा जा रहा है?”
उन्होंने कहा, “कल राज्य सरकार के पास हिंदी लागू करने से संबंधित दोनों सरकारी प्रस्तावों को रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैं मराठी लोगों को दृढ़ रुख अपनाने के लिए बधाई देना चाहता हूं। यह मुद्दा शुरू से ही अनावश्यक था।लोगों के अलावा, मैं कुछ लेखकों, कुछ कलाकारों और मराठी मीडिया के पत्रकारों और संपादकों को भी धन्यवाद देना चाहता हूं, जिन्होंने इस मुद्दे का समर्थन किया।”
गौरतलब है कि राज्य सरकार द्वारा तीन-भाषा नीति लागू करने के कदम की क्षेत्रीय दलों, नागरिक समाज और प्रमुख मराठी हस्तियों ने कड़ी आलोचना की थी। इसे वापस लेने की घोषणा के बाद श्री राज और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने पांच जुलाई को होने वाली संयुक्त विरोध रैली को रद्द कर दिया है। श्री राज ने कहा, “इन सब की बिल्कुल भी जरुरत नहीं थी।” उन्होंने कहा कि एमएनएस तीन-भाषा नीति का विरोध करने वाली पहली पार्टी थी। उन्होंने कहा, “तनाव बढ़ने पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) और अन्य राजनीतिक दल हमारे साथ आ गए। हमने पांच जुलाई को विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी। अगर वह रैली होती तो यह अभूतपूर्व होता। इससे लोगों को संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की याद आ जाती। एकजुट मराठी आवाज का वास्तविक प्रभाव हो सकता है। मुझे उम्मीद है कि सरकार ने इसे समझ लिया है।”
