नयी दिल्ली, 28 जून (वार्ता) केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने शनिवार को कहा कि “आत्ममुग्धता, तानाशाही प्रवृत्ति, अवसरवाद, लोकतांत्रिक सोच की कमी और वंशवादी महत्वाकांक्षाओं के कारण 1975 में आपातकाल थोप दिया गया।
डॉ सिंह ने दिल्ली विधानसभा में “भारतीय लोकतंत्र और संविधान का सबसे अंधकारमय दौर: ना भूलें, ना क्षमा करें” विषय पर आयोजित संगोष्ठी में कहा कि,“1975 से 1977 का संक्षिप्त लेकिन काला कालखंड भारत के हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाला था। मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए, प्रेस पर सख्त सेंसरशिप थोप दी गई और हजारों लोगों को बिना मुकदमा चलाए कैद कर लिया गया। शहरी विकास के नाम पर जबरन नसबंदी और बड़े पैमाने पर तोड़फोड़ की गई। 1976 में पारित 42वां संविधान संशोधन, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पाँच से बढ़ाकर छह वर्ष कर दिया गया जिसे बाद में 44वें संशोधन (1978) द्वारा वापस लिया गया।”
विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा, “आपातकाल के बाद जो जांच शुरू हुई, वह अभी अधूरी है। शाह आयोग की रिपोर्ट (1978) समस्त मानवाधिकार उल्लंघनों और प्रशासनिक अतिक्रमणों की व्यापक जांच नहीं कर सकी। अब समय आ गया है कि एक नया आयोग गठित कर आपातकाल के दौरान और बाद में हुए दमन और अत्याचारों की विस्तृत जांच कराई जाए।”
श्री गुप्ता ने कहा कि “आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन के माध्यम से संविधान में ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द क्यों जोड़े गए? संविधान जैसे दस्तावेज़ में इतने बुनियादी परिवर्तन किसी राष्ट्रीय बहस और सहमति के बिना नहीं किए जा सकते। हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आपातकाल से मिली सीख को जीवित रखे और संविधान की पवित्रता को कभी भी कमजोर न होने दे। इसी उद्देश्य से ऐसे जागरूकता कार्यक्रम और संगोष्ठी किया जाना आवश्यक हैं।”
पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया ने कहा, “संविधान की प्रस्तावना उसकी आत्मा है, जो यह स्पष्ट करती है कि यह संविधान ‘जनता द्वारा और जनता के लिए’ बना है। किसी एक नेता को यह अधिकार नहीं कि वह तानाशाही प्रवृत्तियों के चलते इसके मूल स्वरूप को बिगाड़े। दुर्भाग्यवश, तत्कालीन कांग्रेस ने वही प्रवृत्ति अपनाई जो एक समय ब्रिटिश राज की हुआ करती थी।”
