भारत में कीमतों का स्थिर रहना

यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक और आर्थिक सफलता है कि ईरान इजरायल युद्ध के 11 दिन बाद भी पेट्रोल की कीमतें पूरी तरह से स्थिर हैं. जिस तरह से भारत ने कूटनीतिक संतुलन का परिचय दिया है, उससे विश्व के मंच पर भारत की साख बढ़ी है.पश्चिम एशिया एक बार फिर अस्थिरता के बवंडर में घिरा है. ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक राजनीतिक और ऊर्जा परिदृश्य को गंभीर चुनौती दी है.ऐसे संवेदनशील समय में भारत ने जिस प्रकार संयम, संतुलन और दूरदर्शिता का परिचय दिया है, वह केवल एक कूटनीतिक सफलता नहीं, बल्कि एक परिपक्व और आत्मविश्वासी राष्ट्र की पहचान है.

भारत की यह संतुलित कूटनीति कई स्तरों पर प्रभाव छोड़ती है.एक ओर यह वैश्विक मंच पर भारत की विश्वसनीयता और विवेकशील नेतृत्व को स्थापित करती है, तो दूसरी ओर घरेलू मोर्चे पर आम नागरिक की दैनिक जि़ंदगी को प्रभावित करने वाले कारकों—विशेषत: पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को स्थिर बनाए रखने में भी सहायक सिद्ध होती है. यह दोहरी सफलता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर की रणनीतिक सूझबूझ का परिणाम है, जो आज भारत को “गुटनिरपेक्षता” से आगे बढ़ाकर “बहु-आयामी” के आधुनिक सिद्धांत की ओर ले जा रही है.

पिछले 11 दिनों में, जब दुनिया के अनेक हिस्सों में कच्चे तेल की कीमतें चढ़ रही हैं और आर्थिक अनिश्चितता गहराई है, भारत के अधिकांश महानगरों में पेट्रोल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं. दिल्ली, इंदौर, पटना से लेकर अहमदाबाद तक, उपभोक्ताओं ने ईंधन मूल्य में कोई विशेष उछाल महसूस नहीं किया. यह सतही रूप से महज़ एक आर्थिक उपलब्धि प्रतीत हो सकती है, किंतु इसके पीछे एक जटिल नीति-निर्माण की प्रक्रिया कार्यरत है—जिसमें कर समायोजन, तेल विपणन कंपनियों के साथ संवाद और वैश्विक बाज़ार की सतत निगरानी शामिल है.

भारत की विदेश नीति ने इस पूरे परिदृश्य में संतुलन का एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है. भारत ने न तो ईरान के साथ अपने पारंपरिक ऊर्जा व भू-रणनीतिक संबंधों से समझौता किया, न ही इज़राइल के साथ रक्षा, कृषि और तकनीकी सहयोग में कोई विचलन दिखाया . दोनों पक्षों से संयम और संवाद की अपील करते हुए भारत ने एक सक्रिय, तटस्थ लेकिन नैतिक दृष्टिकोण अपनाया है—जो आज की उथल-पुथल भरी दुनिया में दुर्लभ है. यह भारत की उसी ऐतिहासिक नीति का परिष्कृत रूप है जिसे कभी गुटनिरपेक्षता के रूप में देखा गया था.

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व ने इस नीति को केवल सैद्धांतिक दायरे में नहीं रखा, बल्कि उसे व्यवहारिक रूप में सफलतापूर्वक कार्यान्वित भी किया है.

डॉ. जयशंकर की रणनीतिक दृष्टि और संवेदनशील राजनयिक पहल भारत की इस नीति को और सशक्त बनाती है.संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति भारत की प्रतिबद्धता, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान और क्षेत्रीय शांति की वकालत—ये सभी तत्व भारत की विदेश नीति को केवल “संतुलित” ही नहीं, बल्कि “नैतिक नेतृत्व” का दर्जा देते हैं.

भारत की संतुलित कूटनीति न केवल वर्तमान संकट में एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करती है, बल्कि यह भविष्य की उन सभी चुनौतियों के लिए भी एक प्रभावशाली रूपरेखा है जिनका सामना उभरती हुई वैश्विक शक्तियों को करना होगा.दरअसल, भारत ने अपनी स्थिरता, संवेदनशीलता और सामर्थ्य से यह संकेत स्पष्ट कर दिया है कि वह न केवल तैयार है, बल्कि सक्षम भी.

 

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