नयी दिल्ली, 11 जून (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने एक पूर्व न्यायिक अधिकारी के अपनी नाबालिग बेटी के साथ यौन दुर्व्यवहार के आरोप को ‘चौंकाने वाला मामला’ बताते हुए आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने उनकी याचिका बुधवार को खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति मनमोहन की अंशकालीन कार्य दिवस पीठ ने यह आदेश पारित किया।
पूर्व न्यायिक अधिकारी ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के 15 अप्रैल, 2025 के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत में अपील की थी, जिसमें निचली अदालत की ओर से आरोप तय करने के फैसले पर मुहर लगाई गई थी।
न्यायमूर्ति मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूछा, “बेटी आरोप लगा रही है। यह चौंकाने वाला मामला है। वह एक न्यायिक अधिकारी है और ये गंभीर अनाचार के आरोप हैं। यह चौंकाने वाला है। बेटी ने आरोप लगाए हैं। उसे जीवन भर के लिए आघात पहुंचा होगा। यह कैसे रद्द करने का मामला हो सकता है।”
पीठ ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश तरह तरह की दलीलों को कोई खास तबज्जो नहीं दी और उनके खिलाफ यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम के तहत गंभीर आरोपों पर गौर दिया।
यह मामला मई 2014 और 2018 के दौरान हुई दुर्व्यवहार की कथित घटनाओं के बाद महाराष्ट्र के भंडारा में 21 जनवरी, 2019 को दर्ज एक मुकदमा से संबंधित है।
यह रिकॉर्ड में आया कि आरोप पत्र दायर किया गया था, लेकिन मामले में औपचारिक आरोप तय होना बाकी था। पूर्व न्यायाधीश पर भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के तहत एक महिला पर उसकी शील भंग करने के इरादे से हमला करने के आरोप लगाए गए थे, इसके अलावा पोक्सो अधिनियम की धारा 7, 8, 9, 9 और 10 के तहत भी आरोप लगाए गए थे, जो गंभीर और अनाचारपूर्ण दुर्व्यवहार सहित विभिन्न प्रकार के यौन उत्पीड़न से संबंधित हैं।
