सुप्रीम कोर्ट ने प्रो. महमूदाबाद की अंतरिम जमानत अवधि बढ़ाई

नयी दिल्ली, 28 मई (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने अशोका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रो. अली खान महमूदाबाद

को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ से संबंधित कथित आपत्तिजनक सोशल मीडिया टिप्पणी मामले में हरियाणा में दर्ज दो मुकदमों के तथ्यों पर केंद्रित जांच करने का बुधवार को विशेष जांच दल (एसआईटी) को निर्देश दिया।

शीर्ष अदालत ने प्रो. महमूदाबाद को 21 मई को दी गई अंतरिम जमानत अवधि बढ़ाते हुए कहा कि वह इस मामले में जुलाई में सुनवाई करेगी।

न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अंशकालिक कार्य दिवस पीठ ने याचिकाकर्ता के अधिवक्ता के कपिल सिब्बल की इस आशंका पर कि जांच का दायरा बढ़ाया सकता है, कहा, “हम निर्देश देते हैं कि एसआईटी की जांच दो मुकदमों के तथ्यों तक ही सीमित रहेगी।”

अदालत ने हरियाणा पुलिस से प्रोफेसर महमूदाबाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के संबंध में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के नोटिस पर अपनी प्रतिक्रिया के बारे में भी बताने को कहा।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 21 मई को कहा कि उसने गिरफ्तार अहमूदाबाद के संबंध में एक मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लिया है।

पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता श्री सिब्बल ने आशंका जताई थी कि जांच का इस्तेमाल मुकदमों इतर अन्य चीजों को देखने के लिए भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा था कि पुलिस उनसे (महमूदाबाद) डिवाइस मांग रही है।

पीठ ने इस पर हरियाणा सरकार के वकील से पूछा, “दोनों मुकदमें रिकॉर्ड में दर्ज हैं। ऐसे में डिवाइस की क्या जरूरत है? दायरा बढ़ाने की कोशिश न करें।”

श्री सिब्बल ने पीठ के समक्ष गुहार लगाते हुए यह भी कहा कि महमूदाबाद पर लगाई गई अंतरिम जमानत शर्तों में ढील दी जानी चाहिए‌। अदालत ने 21 मई को अंतरिम जमानत देते हुए पासपोर्ट जमा करने समय कई पाबंदियां लगाई थीं। उनमें पासपोर्ट जब्त करने के अलावा भारत-पाकिस्तान युद्ध पर बोलने की अनुमति नहीं देना भी शामिल है।

पीठ पर राहत के लिए दी गई दलीलों पर कोई असर नहीं पड़ा और उसने फिलहाल कोई छूट देने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह दोनों ऑनलाइन पोस्ट से संबंधित कोई भी ऑनलाइन पोस्ट, लेख या मौखिक भाषण नहीं देंगे, जो जांच का विषय है।

अदालत ने हालांकि कहा कि वह (याचिकाकर्ता) इस घटना के अलावा किसी और विषय पर बात करने के लिए स्वतंत्र हैं।

शीर्ष अदालत ने एसआईटी को जुलाई में अगली सुनवाई की तारीख पर जांच रिपोर्ट पेश करने का निर्देश देते हुए कहा कि वह प्रो. महमूदाबाद को दी गयी अंतरिम जमानत की अवधि बढ़ा रहा है।

इससे पहले शीर्ष अदालत के समक्ष हरियाणा सरकार के वकील ने कहा कहा था कि विशेष जांच दल का गठन हो गया है और इस मामले की जांच की जा रही है।

न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की नियमित पीठ ने 21 मई को याचिकाकर्ता को राहत देते हुए अंतरिम जमानत पर रिहा करने का आदेश पारित किया।

पीठ ने हालांकि मामले में खान के खिलाफ हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज की गई दो मुकदमों पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

शीर्ष अदालत अपने आदेश में कहा था, “हम याचिकाकर्ता को सीजेएम सोनीपत की संतुष्टि के अनुसार जमानत बांड प्रस्तुत करने की शर्त पर अंतरिम जमानत पर रिहा करने का निर्देश देते हैं। दोनों मुकदमों के लिए जमानत बांड का केवल एक सेट होगा।”

इसके अलावा शीर्ष अदालत ने आरोपी खान को अपना पासपोर्ट जमा करने का भी आदेश दिया था। साथ ही, इस भारत-पाकिस्तान युद्ध से संबंधित मुद्दे (ऑपरेशन सिंदूर) पर कोई और ऑनलाइन पोस्ट या भाषण नहीं देने का आदेश दिया था।

पीठ ने मामले की जांच के लिए हरियाणा पुलिस के स्थान पर एक विशेष जांच दल का गठन किया था, जो वर्तमान में मामले की जांच कर रहा है।

शीर्ष अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि विशेष जांच दल में हरियाणा या दिल्ली के अधिकारी नहीं होंगे।

हरियाणा के अशोका विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख महमूदाबाद को हरियाणा पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार किया था। पुलिस ने उन्हें 18 मई, 2025 को दिल्ली में उनके आवास से गिरफ्तार किया। अभियोजन पक्ष ने उन पर ऑपरेशन सिंदूर पर उनकी कथित टिप्पणियों के लिए भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने का आरोप लगाया। निचली अदालत ने दो अलग-अलग मामलों में मुकदमा दर्ज होने पर उन्हें दो दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया था। हरियाणा राज्य महिला आयोग ने भी को महमूदाबाद की टिप्पणियों की आलोचना की थी। आयोग ने कहा था टिप्पणियां भारतीय सशस्त्र बलों में महिला अधिकारियों के प्रति अपमानजनक है और इसने सांप्रदायिक विद्वेष को भी बढ़ावा दिया है।

आयोग ने 12 मई 2025 महमूदाबाद को सम्मन जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि उनकी टिप्पणियों से वर्दीधारी महिलाओं (जिनमें कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह भी शामिल हैं) के प्रति अपमान की चिंता पैदा हुई है, पेशेवर अधिकारियों के रूप में उनकी भूमिकाओं को कमतर आंका गया है, और भारत सरकार पर दुर्भावनापूर्ण इरादे का आरोप लगाते हुए बार-बार ‘नरसंहार’, ‘अमानवीयकरण’ और ‘पाखंड’ का संदर्भ देकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है।

प्रो. महमूदाबाद ने अपने बचाव में स्पष्ट किया था कि उनकी टिप्पणियों को पूरी तरह गलत समझा गया है।

आरोपी महमूदाबाद ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा, “मैं कर्नल सोफिया कुरैशी की प्रशंसा करते हुए इतने सारे दक्षिणपंथी टिप्पणीकारों को देखकर बहुत खुश हूं, लेकिन शायद वे उतनी ही जोर से यह भी मांग कर सकते हैं कि भीड़ द्वारा हत्या, मनमाने ढंग से बुलडोजर चलाने और भाजपा के नफरत फैलाने के शिकार अन्य लोगों को भारतीय नागरिक के रूप में संरक्षित किया जाए।”

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