जबलपुर: जिले में गेंहू की खरीदी फिलहाल अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन किसानों की फसल कटते ही व्यापारी और बिचौलियों की सक्रियता बढ़ने लगी है। अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में काटकर रखे गेंहू को खरीदने के लिए बिचौलिये किसानों से संपर्क कर रहे हैं, जिसमें किसानों से व्यापारी और बिचौलिए फसल को कम रेट में खरीद लेते हैं। कई बार तो बिचौलिए के संपर्क सीधे केंद्रों से होने पर वह किसानों से उनकी फसल के साथ पंजीयन क्रमांक लेकर अपने जुगाड़ से किसानों का गेंहू बेच देते हैं और मिलने वाले समर्थन मूल्य में से यह कुछ कमीशन किसानों द्वारा ले लेते हैं। जिसके कारण किसानों को सरकार द्वारा गेंहू का जितना मूल्य मिलना चाहिए उतना नहीं मिल पाता है और किसान भी खरीदी केंद्रों में आने- जाने के लावा तरह- तरह के खर्चे से बच जाते है, जिससे किसान भी इससे संतुष्ट हो जाता हैं।
150 रूपये से लेकर 200 रूपए तक कमीशन
अधिकतर यह देखा जाता है कि बिचौलिये किसानों से सीधे संपर्क करते हैं और उनके रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ ही उनकी फ़सल को खरीद लेते हैं। अधिकतर बिचौलिए खरीदी केंद्र में खरीदी करने वाली समितियों से संपर्क रहते हैं, जिससे वह आसानी से किसानों द्वारा खरीदी हुई फसल को उनके खरीदी केंद्र में जाकर उन्हीं किसान के रजिस्ट्रेशन से बेच देते हैं। यह बिचौलिये और व्यापारी समर्थन मूल्य के भाव से अपना 150 रूपये से लेकर 200 रूपए तक कमीशन काटकर गेंहू को खरीदते हैं। जिसके बाद वह स्वयं के द्वारा फ़सल को खेतों और गल्लों से उठाकर खरीदी केंद्र पहुंचाते हैं और वहां पर समर्थन मूल्य में बेच देते हैं। इसके बाद जब गेंहू की राशि किसानों के खाते में ही आती है तो फिर बिचौलिए और व्यापारी किसानों से अपना कमीशन ले लेते हैं।
खर्च काटकर उतना ही मिलता है पैसा
देखा जाए तो खरीदी केन्द्रों पर किसानों को होने वाली परेशानियों से बचने के लिए भी कई बार किसान बिचौलियों को ही अपनी फ़सल बेच देते हैं। उल्लेखनीय है कि गेंहू खरीदी केंद्रों में किसानों को स्वयं के वाहन और भाड़ा लगाकर खरीदी केंद्र तक पहुंचाना पड़ता है। उसके बाद वहां पर तुलाई और रखने के लिए भी मजदूरों की जरूरत पड़ती है। वहीं जब गेंहू की तुलाई की जाती है तो पल्लेदारों को भी प्रति बोरे के हिसाब से मूल्य चुकाना पड़ता है। इन सभी खर्चों को काटकर किसानों के पास उतना ही मूल्य बचता है जितना बिचौलिए कमीशन काटते हैं। इसलिए किसानों द्वारा बिचौलिए को ही फ़सल बेच दी जाती है और वह इससे संतुष्ट भी रहते हैं। इसके अलावा खरीदी केंद्रों में होने वाली असुविधा से भी वह बच जाते हैं।
