भारत को रक्षा व्यापार में फायदा मिलने की उम्मीद

यूक्रेन और रूस के बीच जारी युद्ध के कारण जिस तरह से अमेरिका और यूरोप के बीच विवाद बढ़ा है. उसका फायदा भारत को मिल सकता है. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रवैए ने यूरोप को नए सिरे से तनावग्रस्त कर दिया.ऐसा पहली बार हुआ है कि नाटों के देश रूस या चीन की बजाय आपस में ही लडऩे लगे हैं.वैसे इस अभूतपूर्व स्थिति के लिए यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंस्की भी जिम्मेदार है. दरअसल, पिछले दिनों जिस तरह से ट्रंप और जेलेंस्की के बीच तीखी बहस हुई थी, उसके बाद ट्रंप प्रशासन ने यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सहायता रोक दी है. अब इस बात की आशंका जताई जा रही है कि इससे यूक्रेन की सुरक्षा व्यवस्था अचानक ध्वस्त हो जाएगी और रूस के साथ उसका लडऩा मुश्किल हो जाएगा.24 फरवरी, 2022 को रूस द्वारा पूर्ण युद्ध शुरू करने के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका ने यूक्रेन को 180 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता दी है, जिसमें से 66.5 बिलियन डॉलर से अधिक की सैन्य सहायता शामिल है. अमेरिका ने रूस से जंग की शुरुआत के बाद से यूक्रेन की लगभग 20 $फीसदी सैन्य आपूर्ति प्रदान की है, और इसमें सबसे घातक और महत्वपूर्ण उपकरण शामिल हैं.

यूक्रेन को अमेरिका सिर्फ हथियार और गोला-बारूद ही नहीं बल्कि और भी बहुत कुछ देता रहा है. यूक्रेनी सैनिक मोर्चे पर संदेशों के आदान-प्रदान के लिए एलन मस्क के स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशन सिस्टम पर निर्भर हैं.रूस के अहम ठिकानों पर हमला करने के लिए भी यूक्रेन को अमेरिकी खुफिया एजेंसी से मदद मिलती है.अगर अमेरिका सैटेलाइट आदि से मिलने वाले डेटा को यूक्रेन के साथ साझा करना बंद करता है तो इससे रूस पर जवाबी हमला करने की यूक्रेन की क्षमता पर बुरा असर पड़ेगा. यूक्रेन के बाकी सहयोगी चाहकर भी इस मामले में उसकी मदद नहीं कर पाएंगे. यह कड़वी हकीकत है कि अमेरिका की मदद के बिना यूरोप भी उसकी बहुत दिनों तक मदद नहीं कर पाएगा. यह हकीकत जेलेंस्की भी अच्छी तरह समझते हैं. इसीलिए वो ट्रंप से अच्छे रिश्ते की गुहार लगा रहे हैं. हालांकि यूक्रेन के राष्ट्रपति को बड़बोलापन दिखाने से पहले यह सब सोचना था कि उनकी इस हरकत के कारण यूक्रेन और यूरोप का कितना नुकसान हो रहा है ?

बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और यूरोप के बीच की इस दरार से भारत को फायदा हो सकता है.दरअसल, नाटो में शामिल यूरोपीय देश मोटे तौर पर अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर करते हैं.नाटो की सुरक्षा के लिए अमेरिका ही सबसे ज्यादा खर्चा करता है. अब डोनाल्ड ट्रंप नाटो से भी निकलने के धमकी दे रहे हैं. यदि अमेरिका नाटो से हाथ पीछे खींचता है, तो यूरोपीय देशों को अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी. उन्हें अपनी सेनाओं को मजबूत करने के लिए बड़ी मात्रा में हथियार और गोला-बारूद खरीदने होंगे. इसमें भारत एक बड़ा सप्लायर बनकर उभर सकता है. भारत तेजी से अपनी डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग और डिफेंस एक्सपोर्ट बढ़ा रहा है.यूरोपीय देशों के पास कम कीमत में हथियार खरीदने के लिए भारत एक बेहतर विकल्प होगा.जाहिर है

भारत अपनी मजबूत डिफेंस इंडस्ट्री के साथ यूरोपियन यूनियन की डिफेंस इंडस्ट्री सप्लाई चेन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. दरअसल,भारत का डिफेंस एक्सपोर्ट एक दशक पहले सिर्फ 2,000 करोड़ रुपये सालाना था, जो अब 21,000 करोड़ रुपये हो गया है. 2024 में कई कंपनियों ने गोला-बारूद मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट लगाने के लिए निवेश शुरू किया है.देश में कम से कम सात नए प्लांट लग रहे हैं, जो विभिन्न ग्रेड के गोला-बारूद का उत्पादन करेंगे. यूरोप से आने वाली डिमांड से हमारी डिफेंस इंडस्ट्री कई गुना बढ़ जाएगी.कुल मिलाकर अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां भारत के रक्षा निर्यात के लिए अपने आप अनुकूल हो रही हैं.

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