पक्षपातपूर्ण और निहित स्वार्थ की राजनीतिक असहिष्णुता पर अंकुश जरूरी : धनखड़

नयी दिल्ली 02 मार्च (वार्ता) उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने राष्ट्रहित को दरकिनार करने वाली पक्षपातपूर्ण और निहित स्वार्थ वाली राजनीतिक असहिष्णुता पर अंकुश लगाये जाने की जरूरत पर बल दिया है।

श्री धनखड़ ने तिरुवनंतपुरम में ‘लोकतंत्र, जनसांख्यिकी, विकास और भारत का भविष्य’ विषय पर चौथा पी. परमेश्वरन स्मारक व्याख्यान देते हुए कहा कि हम एक ऐसे खतरनाक दौर में जी रहे हैं जहां राष्ट्रीय हित को नजरंदाज कर राष्ट्र विरोधी कथानक बनाये जा रहे हैं। उन्होंंने कहा,“ हम ऐसे हालातों का सामना कर रहे हैं, जहां राष्ट्रीय हित को दरकिनार कर दिया जाता है। राष्ट्र-विरोधी कथानक हवा में उछल रहे हैं। हम बहुत खतरनाक दौर में जी रहे हैं। राष्ट्रवाद की कीमत पर पक्षपातपूर्ण और व्यक्तिगत हितों को बढ़ावा देने वाली राजनीतिक असहिष्णुता और लापरवाह रुख को नियंत्रित करने और सामाजिक परामर्श की आवश्यकता है।”

देश में राजनीतिक रूप से विभाजनकारी माहौल पर विचार रखते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा, ‘‘हम कुछ पहलुओं पर चिंताजनक परिदृश्यों से घिरे हुए हैं। राजनीति केन्‍द्रीकृत हो गई है, उपरोक्‍त रूप से विभाजनकारी है, तापमान हमेशा उच्च रहता है। मूल राष्ट्रीय मूल्य और सभ्यतागत मूल्य केंद्रीय विषय नहीं हैं। इस देश में जहां विविधता एकता में परिलक्षित होती है, यह देश जो समावेशिता के अपने सनातन मूल्यों पर गर्व करता है, हम इन मूल मूल्यों से दूर होने और ध्रुवीकृत, विभाजनकारी गतिविधियों में शामिल होने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं… जैसे-जैसे सार्थक संवाद धीमा पड़ता है, वैसे-वैसे सहयोग, सहभागिता और आम सहमति के स्तंभ भी धीमे होते जाते हैं।’’

संवाद और विचार-विमर्श के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘मुझे आपके साथ अपनी पीड़ा, अपना दर्द साझा करना चाहिए। संसद को लोगों के लिए आदर्श होना चाहिए। यह लोगों की आकांक्षाओं को वास्तविकता में बदलने का एक मंच है। इसे संवाद, बहस, चर्चा और विचार-विमर्श का अभेद्य गढ़ होना चाहिए और इन पहलुओं का उदाहरण संविधान सभा ने दिया था जिसने 18 सत्रों में लगभग तीन साल तक काम किया था। और आज हम क्या देख रहे हैं? संवाद, विचार-विमर्श और अन्य चीजें अशांति और व्यवधान की भेंट चढ़ गई हैं। क्या इससे भी अधिक भयंकर अपवित्रता हो सकती है जब लोकतंत्र के मंदिर व्यवधान और अशांति से तबाह हो जाएं? हमारे लोकतंत्र को जीवित रहना है और पहली परीक्षा संसदीय कार्यप्रणाली की है।”

उन्होंने कहा, ‘‘अभी देश में चुनावी दृष्टिकोण से ऐसे क्षेत्र हैं, जहां चुनाव का कोई मतलब नहीं है। देश में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे किले बने हैं, जहां चुनाव के नतीजे हमेशा जनसांख्यिकीय अव्यवस्थाओं के कारण प्रभावित होते हैं। इन चुनौतियों का समाधान करना, जो बहुत कठिन हैं, केवल नीतिगत हस्तक्षेप पर्याप्त नहीं हैं। हमें इन चुनौतियों को हमारे राष्ट्रवाद और हमारे लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए समझना और पहचानना होगा… कोई देश लाखों अवैध प्रवासियों को कैसे झेल सकता है? उनकी संख्या देखें। वे इस देश के लिए कितना खतरा लेकर आए हैं, इसे देखें। इस देश में हर व्यक्ति राष्ट्रवाद के जोश से भरा हुआ है। ये लोग आते हैं, हमारे रोजगार, हमारे स्वास्थ्य, हमारे शिक्षा क्षेत्रों पर मांग करते हैं और फिर चुनावी राजनीति में एक कारक बन जाते हैं। यह बहुत जरूरी है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हम एक मुश्किल स्थिति में हैं। हमें जागरूकता पैदा करनी चाहिए। लोगों की मानसिकता को सक्रिय करना चाहिए। हर भारतीय को इस चुनौती का सामना करने के लिए कुशल होना चाहिए। अनियंत्रित प्रवाह हमारी संस्कृति को भी खतरे में डाल रहा है। मैं आग्रह करूंगा कि हमें इन जनसांख्यिकीय अव्यवस्थाओं को साहसपूर्वक विफल करना चाहिए।’’

धर्मांतरण की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘चुनौती विभिन्न रूपों में आ रही है इनमें से एक है लालच, प्रलोभन, जरूरतमंदों और कमजोरों तक पहुंचना, सहायता प्रदान करना, और फिर एक सूक्ष्म तरीके से धर्म परिवर्तन का सुझाव देना, जिसे धर्मांतरण कहा जाता है। देश सभी को अपनी पसंद का धर्म रखने की अनुमति देता है, यह हमारा मौलिक अधिकार है, यह हमें हमारी सभ्यतागत संपदा से मिला है लेकिन अगर इसमें छेड़छाड़ की जाती है, इसे तोड़ा-मरोड़ा जाता है, तो इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता… लालच और प्रलोभन इसके लिए आधार नहीं हो सकते। जब कोई दर्द में हो, कठिनाई में हो, जरूरत में हो, तो उनकी मदद करते हुए उन्हें धर्मांतरण की ओर न खींचें, यह असहनीय है। चाहे मैं कितनी भी कोशिश करूं, मैं चिंता की गंभीरता को व्यक्त नहीं कर पाऊंगा, हम धर्मांतरण को प्रभावित करने के उद्देश्य से इन रणनीतिक, सुनियोजित, आर्थिक रूप से समर्थित दुस्साहसों के कारण चुनौती का सामना कर रहे हैं।’’

श्री धनखड़ ने कहा, ‘‘श्री पी. परमेश्वरन भारतीय मूल्यों के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता, भारतीय लोकाचार की उनकी गहरी समझ और राष्ट्रीय एकता के लिए उनका अथक प्रयास पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। एक आत्मनिर्भर भारत, सांस्कृतिक रूप से निहित और आध्यात्मिक रूप से जागृत भारत के लिए उनका दृष्टिकोण पूरे देश में गहराई से गूंजता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘भारत के महानतम सपूतों में से एक की स्मृति में यह स्मारक व्याख्यान है। वे इस सदी में हिंदू विचार प्रक्रिया के अग्रणी विचारकों में से एक हैं। हम इस व्याख्यान के माध्यम से सामाजिक कार्य के लिए प्रतिबद्ध सबसे बेहतरीन बुद्धिजीवियों में से एक का सम्मान कर रहे हैं… एक सभ्यता को केवल एक मूलभूत विचार से ही जाना जाता है। क्या यह वास्तव में अपने महान सपूतों का सम्मान करती है? और पिछले कुछ वर्षों में यही विषय रहा है। हमारे भूले हुए नायक, गुमनाम नायक, या यूं कहें कि अदृश्य नायक, हमने उन्हें याद किया है।’’

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