सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए व्यापक कानून बनाने का केंद्र को दिया निर्देश

नयी दिल्ली, 29 जनवरी (वार्ता) उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को घरेलू कामगारों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए एक व्यापक कानून बनाने का बुधवार को निर्देश दिया।

न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने श्रम और रोजगार मंत्रालय को संबंधित मंत्रालयों के सहयोग से ऐसे कानून की व्यवहार्यता का आकलन करने और छह महीने के भीतर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया।

पीठ ने शहरी घरों में खाना पकाने, सफाई और देखभाल जैसे आवश्यक कार्य करने वाले घरेलू कामगारों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।

शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि उनकी (कामगारों) बढ़ती मांग के बावजूद राष्ट्रव्यापी विधायी ढांचा नहीं होने के कारण वे शोषण और दुर्व्यवहार के प्रति संवेदनशील हैं।

न्यायमूर्ति सूर्य कांत द्वारा लिखे गए अपने फैसले में न्यायालय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि अधिकांश घरेलू कामगार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों सहित हाशिए के समुदायों से आते हैं। वे अक्सर आर्थिक तंगी के कारण घरेलू काम करते हैं। उन्हें कम वेतन, असुरक्षित काम करने की स्थिति और लंबे समय तक काम करने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

अदालत ने घरेलू कामगारों के अधिकारों के इर्द-गिर्द मौजूद ‘कानूनी शून्यता’ को रेखांकित किया और कहा कि उन्हें कई प्रमुख श्रम कानूनों से बाहर रखा गया है, जिसमें वेतन भुगतान अधिनियम, 1936, समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976, कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 और किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 शामिल हैं।

शीर्ष अदालत ने मजदूरी संहिता, 2019 और सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020 के तहत पेश किए गए प्रावधानों (जो घरेलू कामगारों को ‘असंगठित कामगारों’ के दायरे में लाते हैं) को स्वीकार करते हुए‌ कहा कि विशिष्ट सुरक्षा वाले अखिल भारतीय कानून का अभी भी अभाव है।

शीर्ष अदालत के फैसले में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के दिशा-निर्देशों सहित अंतर्राष्ट्रीय मानकों का उल्लेख किया गया और घरेलू कामगारों के कल्याण के लिए कानून बनाने के पिछले, लेकिन असफल प्रयासों का उल्लेख किया गया।

तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने घरेलू कामगारों के लिए कल्याण बोर्ड स्थापित किए हैं। केरल ने केरल घरेलू कामगार (विनियमन और कल्याण) विधेयक, 2021 पेश किया है।

शीर्ष अदालत ने अपने विशेष क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए श्रम और रोजगार मंत्रालय को सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, महिला और बाल विकास मंत्रालय और कानून और न्याय मंत्रालय के साथ समन्वय करके एक विशेषज्ञ समिति बनाने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा, “विशेषज्ञ समिति की संरचना भारत सरकार और उसके संबंधित मंत्रालयों के विवेक पर छोड़ दी गई है। यह सराहनीय होगा यदि समिति छह महीने की अवधि के भीतर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करती है, जिसके बाद भारत सरकार एक कानूनी ढांचा पेश करने की आवश्यकता पर विचार कर सकती है जो घरेलू कामगारों के कारण और चिंता को प्रभावी ढंग से संबोधित कर सके।”

शीर्ष अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि घरेलू कामगारों के अधिकारों की रक्षा और उनकी गरिमा एवं सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विधायी हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि उसे उम्मीद है कि केंद्र सरकार विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों के आधार पर त्वरित कार्रवाई करेगी।

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