चारा उत्पादन बढ़ाने और पशुधन संबंधी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने के लिए केन्द्र सरकार की संयुक्त पहल

नयी दिल्ली, 05 नवंबर (वार्ता) केन्द्रीय ग्रामीण विकास विभाग (डीओआरडी) और पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण): वीबी-जी राम जी अधिनियम, 2025 के तहत अभिसरण (कन्वर्जेंस) के माध्यम से चारा सुरक्षा, चारागाह विकास और पशुधन को सहयोग देने वाली अवसरंचना को मजबूत करने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को संयुक्त रूप से एक परामर्श जारी किया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार यह पहल चारे की कमी को दूर करने, पशुधन से जुड़ी बुनियादी ढांचों को मजबूत करने और ग्रामीण परिवारों, विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों तथा पशुधन एवं डेयरी गतिविधियों पर निर्भर भूमिहीन परिवारों की आजीविका को बेहतर बनाने के लिए सरकार के समग्र दृष्टिकोण को अपनाया गया है।

इसके तहत ग्रामीण रोजगार और गांवों में परिसंपत्तियों के निर्माण को पशुधन क्षेत्र की जरूरतों से जोड़ा जाएगा।इसके साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि सभी कार्य अधिनियम के प्रावधानों और निर्धारित योजना के अनुरूप हों। एक जुलाई 2026 को वीबी-जी राम जी अधिनियम, लागू हुआ, जो प्रत्येक ग्रामीण परिवार को प्रति वर्ष 125 दिनों के मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी प्रदान करता है और चार विषयगत क्षेत्रों में टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करता है। इसमें आजीविका से संबंधित अवसरंचना और प्रतिकूल मौसमी घटनाओं के प्रभावों को कम करना भी शामिल है। संयुक्त परामर्श का उद्देश्य इस संरचना का उपयोग करके चारा उत्पादन को बढ़ावा देने, सामुदायिक चारागाहों को विकसित करने और पशुधन को सहयोग देने वाली अवसरंचना को मजबूत करना है।

परामर्श में वीबी-जी राम जी फ्रेमवर्क के तहत 375 अनुमेय कार्यों की सूची में से 22 प्रासंगिक कार्यों की पहचान की गई है। इनमें चारा उत्पादन और भंडारण, चारागाह विकास, पशु आश्रय स्थलों, डेयरी संबंधी बुनियादी ढांचे (अवसंरचनाएं) और पशु चिकित्सा स्वास्थ्य सुविधाओं से संबंधित क्रियाकलाप शामिल हैं। इन क्रियाकलापों का उद्देश्य चारे की उपलब्धता में सुधार करना, पशुधन को सहयोग देने वाले बुनियादी ढांचे को मजबूत करना और पशुधन आधारित आजीविका को अधिक टिकाऊ बनाने में योगदान देना है। सभी कार्य अनुमेय कार्यों की अनुमोदित सूची और अधिनियम, नियमों तथा दिशा-निर्देशों के लागू प्रावधानों के अनुसार किए जाएंगे।

यह परामर्श विकेंद्रीकृत, निचले स्तर से ऊपर और पंचायती राज संस्थाओं (पीआरआई) के नेतृत्व में नियोजन पर विशेष बल दिया गया है। इसमें चारा विकास और पशुधन को सहयोग देने वाली अवसंरचना को विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं (वीजीपीपी) में शामिल करने तथा ग्राम सभा के माध्यम से अनुमोदित स्थानीय विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप बनाने पर बल दिया गया है।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को प्रोत्साहित किया गया है कि वे स्थानीय आवश्यकताओं, अनुमोदित योजनाओं और लागू दिशा-निर्देशों के अनुरूप, जहां संभव हो, कार्यक्रम के कुल व्यय में चारा एवं पशुधन को सहयोग देने वाले कार्यों पर व्यय को धीरे-धीरे बढ़ाकर कम-से-कम पांच प्रतिशत तक ले जाने का प्रयास करें।

चारा और पशुधन से संबंधित परिसंपत्तियों की आवश्यकता वाले पात्र परिवारों और समुदायों की पहचान करने के लिए आवश्यकता-आधारित संतृप्ति दृष्टिकोण अपनाने को भी प्रोत्साहित किया गया है। ग्राम पंचायतें उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे सकती हैं, जहां बड़ी संख्या में लोग पशुधन पर निर्भर हैं। इसमें स्थानीय आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के आधार पर ऐसी ग्राम पंचायतें भी शामिल हैं, जहां 30 प्रतिशत से अधिक आबादी पशुधन पर निर्भर है।

भारतीय चारागाह एवं चारा अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार की गई राज्य-विशिष्ट चारा संसाधन विकास योजनाएं जिला और ब्लॉक स्तरों पर योजना बनाने के लिए मार्गदर्शक दस्तावेजों के रूप में उपयोग की जा सकती हैं। यह परामर्श जलवायु-अनुकूल क्रियाकलापों पर भी ध्यान देने को प्रोत्साहित करता है, जिसमें उपयुक्त चारे की किस्में, बारहमासी घासें और एकीकृत फसल-पशुधन प्रणालियां शामिल हैं, जहां भी ये प्रासंगिक हों और अनुमेय कार्यों के अंतर्गत आती हों। यह परामर्श राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से ग्रामीण विकास, पशुपालन, कृषि और अन्य संबंधित क्षेत्रों के विभागों के बीच अभिसरण के माध्यम से चारा सुरक्षा और पशुधन बुनियादी ढांचे के लिए व्यापक राज्य कार्ययोजनाएं तैयार करने का आह्वान करता है।

इस समन्वित दृष्टिकोण का उद्देश्य योजना में सुधार करना, उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग को सुगम बनाना और यह सुनिश्चित करना है कि निवेश स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो और सतत पशुधन-आधारित आजीविका का सहयोग करे। परामर्श इस बात को दोहराता है कि चारा विकास और पशुधन को सहयोग देने वाले सभी कार्य वीबी-जी राम जी अधिनियम, 2025 के लागू प्रावधानों का पालन करते हुए किए जाने चाहिए। इनमें विकेंद्रीकृत एवं पंचायती राज संस्थाओं के नेतृत्व में योजना बनाने, अनिवार्य सामाजिक अंकेक्षण (सोशल ऑडिट), सामग्री घटक पर जिला स्तर पर 40 प्रतिशत की सीमा, अनुसूची-एक के प्रावधानों के अनुसार व्यक्तिगत लाभार्थियों का चयन, साप्ताहिक सार्वजनिक प्रकटीकरण (डिस्क्लोज़र) और शिकायत निवारण शामिल हैं।

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से यह भी आग्रह किया गया है कि वे प्रभावी योजना बनाने और कार्यान्वयन को सुगम बनाने के लिए अनुमोदित परामर्श का संबंधित विभागों, पंचायती राज संस्थानों और क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं के बीच व्यापक प्रचार-प्रसार सुनिश्चित करें। यह परामर्श इस बात को रेखांकित करता है कि ग्रामीण विकास नियोजन में चारा सुरक्षा एवं पशुधन-सहायक अवसंरचना को उचित प्राथमिकता प्रदान करने के लिए राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा समन्वित कार्रवाई अत्यंत महत्वपूर्ण है।

यह संयुक्त परामर्श ग्रामीण रोजगार, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और पशुधन विकास को एकीकृत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। वीबी-जी राम जी के तहत अनुमेय कार्यों को स्थानीय चारा एवं पशुधन अवसंरचना संबंधी आवश्यकताओं के साथ जोड़कर, यह पहल चारे की उपलब्धता में सुधार करने, डेयरी और पशुपालन गतिविधियों को सहयोग देने तथा ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका के अवसरों को मजबूत करने का प्रयास करती है। अभिसरण, विकेंद्रीकृत योजना बनाने और समन्वित कार्यान्वयन के माध्यम से, इस पहल का उद्देश्य राज्यों और पंचायती राज संस्थाओं को ऐसी टिकाऊ परिसंपत्तियों के निर्माण में सहायता प्रदान करना है, जो स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हों, जलवायु-अनुकूल ग्रामीण विकास को मदद करती हो और विकसित भारत 2047 के व्यापक दृष्टिकोण को साकार करने में योगदान करें।

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