भुवनेश्वर 05 नवंबर (वार्ता) राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने ओडिशा के जाजपुर जिले में क्रशर यूनिट में कथित हमले में मारे गये एक मजदूर की मौत के मामले में पुलिस और अन्य सरकारी अधिकारियों की गंभीर लापरवाही पर प्रदेश सरकार से जवाब मांगा है।
आयोग कहा कि मारे गए मज़दूर अरिजीत जेना (22) के परिवार को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने की सिफारिश क्यों नहीं करनी चाहिए, साथ ही पुलिस और दूसरे सरकारी अधिकारियों की गंभीर चूकों को भी चिन्हित किया है। राज्य सरकार को जवाब देने के लिए चार हफ़्ते का समय दिया गया है।
आयोग ने ओडिशा के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि वे पुलिस की इस लापरवाही की जांच पुलिस उपाधीक्षक या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी से कराएं और उसकी रिपोर्ट आयोग को सौंपें।
आयोग ने मानवाधिकार कार्यकर्ता श्रीकांत पकल की याचिका पर कार्रवाई करते हुए कहा कि एफआईआर दर्ज करने में देरी और जांच में कथित लापरवाही से पीड़ित के जीवन और सम्मान के अधिकार और उसके परिवार के अनुच्छेद 21 के तहत समय पर न्याय पाने के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
आयोग ने गत 28 अक्टूबर के एक आदेश में अपनी रजिस्ट्री को मुख्य सचिव के ज़रिए राज्य सरकार को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्देश दिया, जिसमें पूछा गया कि मृतक के परिवार वालों को 10 लाख रुपये का मुआवज़ा देने की सिफारिश क्यों न की जाए।
जेना पर 27 अप्रैल, 2025 को धर्मशाला ब्लॉक में पद्माबती क्रशर यूनिट में उसके मालिक और साथियों ने लोहे की रॉड से कथित तौर पर हमला किया था। एक मई को एससीबी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल में उसकी मौत हो गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने पुलिस कार्रवाई में देरी करने के लिए राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किया और पीड़ित के परिवार को धमकाया।
आयोग ने कहा कि जेना को 28 अप्रैल को धर्मशाला प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती कराया गया था और बाद में एससीबी को रेफर कर दिया गया, लेकिन एफआईआर उनकी मौत के एक दिन बाद दो मई को ही दर्ज की गई। आयोग ने सवाल किया कि क्या अस्पतालों ने पुलिस को चिकित्सा कानूनी मामला के बारे में बताया था और अगर हाँ, तो पहले एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई।
आयोग ने क्रशर मालिक के खिलाफ लंबित जांच पर भी ध्यान दिलाया, जबकि तीन अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया जा चुका था।
