नयी दिल्ली, 02 नवंबर (वार्ता) कांग्रेस ने सार्वजनिक क्षेत्र के आईडीबीआई बैंक की बिक्री में गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए केंद्र सरकार से सौदा तत्काल रोकने, पूरे मामले की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच कराने और मूल्यांकन रिर्पोटों को सार्वजनिक करने की मांग की है। कांग्रेस प्रवक्ता एवं राज्यसभा के पूर्व सांसद शक्तिसिंह गोहिल ने सोमवार को यहां पार्टी मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि केंद्र सरकार आईडीबीआई बैंक को कनाडा की कंपनी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को बेच रही है और इस सौदे में कई गंभीर सवाल उठते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बैंक को खरीदने वाली कंपनी के प्रतिनिधियों के बयान से पता चलता है कि खरीद के लिए भुगतान में आईडीबीआई बैंक के ही पैसे का इस्तेमाल किया जा सकता है।
श्री गोहिल ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की स्थापना का उद्देश्य देश के संसाधनों और सुविधाओं को आम नागरिकों तक पहुंचाना था। पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की शुरुआत की और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कार्यकाल में एक जुलाई 1964 को आईडीबीआई बैंक की स्थापना हुई ताकि छोटे कारोबारियों और सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों को ऋण मिल सके तथा औद्योगिक विकास और रोजगार को बढ़ावा मिले। उन्होंने कहा कि आईडीबीआई बैंक ने 2021 से 2026 के बीच कुल 30,105 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया है। बैंक ने 2021 में 1,359 करोड़ रुपये, 2022 में 2,439 करोड़ रुपये, 2023 में 3,645 करोड़ रुपये, 2024 में 5,634 करोड़ रुपये, 2025 में 7,515 करोड़ रुपये और 2026 में 9,513 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। उन्होंने सवाल किया कि लगातार मुनाफा कमाने वाले बैंक को विदेशी कंपनी के हाथों में क्यों सौंपा जा रहा है।
श्री गोहिल ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के शेयरों सहित आईडीबीआई बैंक में अपनी 62.72 प्रतिशत हिस्सेदारी फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स को 52,878 करोड़ रुपये में बेचने का फैसला किया है। उन्होंने कहा कि इस सौदे से बैंक का नियंत्रण और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम का दर्जा समाप्त हो जाएगा। मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले बैंक के शेयर का मूल्यांकन 94.42 रुपये प्रति शेयर किया गया था, लेकिन बोली खुलने के बाद इसे बदलकर 75 रुपये प्रति शेयर कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि बोली खुलने के बाद मूल्यांकन बदलना नियमों के विपरीत है। उन्होंने सरकार से दोनों मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक करने और दूसरे बोलीदाता का विवरण सामने रखने की मांग की।
उन्होंने कहा कि 2003 में तत्कालीन वित्त मंत्री जसवंत सिंह ने संसद में आश्वासन दिया था कि आईडीबीआई बैंक में सरकार की हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम नहीं होगी। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार इस आश्वासन के विपरीत काम कर रही है। उन्होंने इस संबंध में संसद में दिए गए तत्कालीन वित्त मंत्री के वक्तव्य का वीडियो भी संवाददाता सम्मेलन में दिखाया। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि भारतीय रिजर्व बैंक के नियमों के तहत एक बैंक में नियंत्रण रखने वाली कंपनी को दूसरे बैंक में नियंत्रण हासिल करने के मामले में राहत क्यों दी गई। उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि विदेशी कंपनी आईडीबीआई बैंक को खरीदने के लिए धन कहां से और किस तरह जुटाएगी तथा उसे दो साल के भीतर दूसरे बैंक में अपनी हिस्सेदारी घटाने की सुविधा क्यों दी गई।
श्री गोहिल ने आरोप लगाया कि बैंक की बिक्री से उसकी संपत्तियों और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के रूप में मिलने वाले लाभों पर भी सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने कहा कि बैंक के सार्वजनिक क्षेत्र से बाहर जाने पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, दिव्यांगों और महिलाओं के लिए उपलब्ध रोजगार के अवसरों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने बैंक की संपत्तियों के मूल्य और उनके भविष्य को लेकर भी सरकार से पारदर्शिता बरतने की मांग की। उन्होंने कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पहले भी आईडीबीआई बैंक के कर्मचारियों के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर बैंक को विदेशी कंपनी के हाथों में बेचने का विरोध किया था और इस संबंध में सरकार से सवाल पूछे थे। श्री गोहिल ने आरोप लगाया कि सरकार ने इन सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं दिया है।
इस बीच कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि आईडीबीआई बैंक के पैसे से ही विदेशी कंपनी सरकार से आईडीबीआई बैंक खरीद रही है। उन्होंने इसे मोदी सरकार का एक और बड़ा घोटाला बताते हुए आईडीबीआई बैंक की बिक्री प्रक्रिया तत्काल रोकने, पूरे मामले में हुई अनियमितताओं की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने तथा दोनों मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग की है। पार्टी ने बोली खुलने के बाद मूल्यांकन बदलने के कारणों, दूसरे बोलीदाता के विवरण और विदेशी कंपनी द्वारा खरीद के लिए धन जुटाने के स्रोतों की जानकारी भी सार्वजनिक करने की मांग की।

