मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जन महाभियोग प्रस्ताव पारित 

नई दिल्ली, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास के लॉन में विपक्षी इंडिया गठबंधन द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक ऐतिहासिक और प्रतीकात्मक जन महाभियोग का आयोजन किया. मॉक संसद में विभिन्न तथ्यों को आधार बनाकर लगभग तीस वक्ताओं ने सीईसी के खिलाफ आरोप लगाते हुए उनसे तत्काल इस्तीफे और उन पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की मांग की है.

संसद के सेंट्रल हॉल की तर्ज पर सजाए गए इस परिसर में मॉक संसद की यह पूरी कार्यवाही लगभग तीन घंटे तेईस मिनट तक चली, जिसमें 19 विपक्षी दलों के 215 सांसदों ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई. लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने इस विशेष सदन की अध्यक्षता की, जबकि समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद और तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सौगत राय ने उपाध्यक्ष के रूप में पीठ का संचालन किया. समूची कार्यवाही के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों, नागरिक समाज के प्रबुद्ध जनों और मतदाता सूची के एसआईआर अभियान के कारण प्रभावित हुए आम नागरिकों सहित लगभग तीस वक्ताओं ने अपनी गंभीर बात रखी.

अध्यक्षता कर रहीं मीरा कुमार ने सत्र की शुरुआत करते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान का अधिकार भारतीय लोकतंत्र की मूल आत्मा है. उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि देश के करोड़ों वैध नागरिकों के नाम मतदाता सूची से बिना किसी पारदर्शी प्रक्रिया के काट दिए गए हैं और इस संबंध में संवैधानिक संस्था की कोई जवाबदेही तय नहीं हो रही है. उन्होंने साफ कहा कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की रक्षा के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके पद से तत्काल हटाना बेहद अनिवार्य हो गया है. इसी क्रम में उपाध्यक्ष की भूमिका निभा रहे टीएमसी सांसद सौगत राय ने सदन को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि विपक्ष ने नियमों के तहत संसद के दोनों सदनों में महाभियोग का औपचारिक नोटिस दिया था, लेकिन सरकार ने जानबूझकर उस पर चर्चा कराने की अनुमति नहीं दी, जिसके कारण मजबूरन पूरे विपक्ष को सड़क पर उतरकर जनता की अदालत लगानी पड़ी है.

सदन में मुख्य महाभियोग प्रस्ताव का संकल्प पत्र राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पेश किया, जिसमें उन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ छह गंभीर आरोपों की रूपरेखा रखी. खड़गे ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के सीधे निर्देश पर काम करते हुए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के जरिए देश के 13.2 करोड़ वैध मतदाताओं के नाम सूची से अवैध रूप से बाहर कर दिए. उन्होंने आरोप मढ़ा कि संसद की बिना किसी अनुमति या पूर्व निगरानी के चुनावी फॉर्म-6 के प्रारूप में एकतरफा बदलाव किए गए, ईसीआईएनईटी प्रणाली के जरिए डेटा पर अनुचित नियंत्रण स्थापित किया गया और आयोग के भीतर अन्य दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों को पूरी तरह दरकिनार कर तानाशाही रवैया अपनाया गया.

इस बहस को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं ने निर्वाचन आयोग के रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की.

समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक ने उत्तर प्रदेश का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि जानबूझकर एक खास रणनीति के तहत पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के नाम मतदाता सूची से गायब किए गए हैं, ताकि चुनावी नतीजों को प्रभावित किया जा सके. राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने बेहद आक्रामक अंदाज में कहा कि चुनाव आयोग अब स्वायत्त संस्था न रहकर पूरी तरह से कार्यपालिका का एक एक्सटेंशन काउंटर बन चुका है, जहां से केवल विपक्ष को परेशान करने और सत्तापक्ष को फायदा पहुंचाने की स्क्रिप्ट लिखी जाती है. तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने तीखा हमला बोलते हुए चुनाव आयोग को सत्ता के शीर्ष नेताओं के हाथों की कठपुतली करार दिया और कहा कि आयोग का तंत्र निष्पक्षता की कसौटी पर पूरी तरह फेल हो चुका है. झारखंड मुक्ति मोर्चा की सांसद महुआ माझी ने आदिवासियों और दूर-दराज के क्षेत्रों के मतदाताओं का पक्ष रखते हुए कहा कि झारखंड के सुदूर इलाकों में रहने वाले गरीब लोगों के नाम कागजी हेरफेर और डिजिटल डिवाइड का बहाना बनाकर काट दिए गए, जो उनके बुनियादी लोकतांत्रिक हक पर डकैती जैसा है.

राजनीतिक दलों के अलावा नागरिक समाज के प्रमुख चेहरों और बुद्धिजीवियों ने भी इस जन महाभियोग में अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया. सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों ने अपने संयुक्त वक्तव्य में डेटा और जमीनी सर्वे के आंकड़े प्रस्तुत करते हुए कहा कि लोकतंत्र तब तक जीवित नहीं रह सकता जब तक कि चुनाव कराने वाली संस्था पर जनता का विश्वास बहाल न हो. उन्होंने चुनाव आयोग की हालिया कार्यप्रणाली को देश के संवैधानिक इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया.

इस सभा की सबसे भावुक और प्रामाणिक कड़ी वे आम नागरिक बने, जिन्हें इस मॉक संसद के मंच पर अपनी बात रखने का मौका मिला. देश के विभिन्न हिस्सों से आए इन प्रभावित नागरिकों ने भरे सदन में अपने वैध पासपोर्ट, आधार कार्ड और दशकों पुराने मतदाता पहचान पत्र दिखाते हुए गवाही दी कि तमाम वैध दस्तावेज होने के बावजूद मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर रातों-रात उनके नाम काट दिए गए. उन्होंने सदन के सामने सवाल उठाया कि यदि देश का मुख्य चुनाव आयुक्त ही उनके मतदान का अधिकार छीन लेगा, तो वे अपनी नागरिकता का प्रमाण देने कहां जाएंगे.

इस विशेष जन महाभियोग सत्र का समापन भाषण लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिया, जिन्होंने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग पर तीखे प्रहार किए. राहुल गांधी ने चुनावी अनियमितताओं और इतनी बड़ी संख्या में वोट काटने का हवाला देते हुए दावा किया कि वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह अवैध था क्योंकि उसमें हार-जीत का अंतर महज तीन प्रतिशत मतों का था. उन्होंने देश की राजनीतिक स्थिति पर क्षोभ प्रकट करते हुए कहा कि यह बेहद दुखद है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली और संवैधानिक मर्यादाओं पर चर्चा करने के लिए समूचे विपक्ष को संसद भवन के बजाय एक घर के बगीचे में बैठना पड़ रहा है, क्योंकि विपक्ष के लिए बाकी सभी संस्थागत रास्ते बंद कर दिए गए हैं. सत्र के अंत में सभी उपस्थित सांसदों ने ध्वनिमत से ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने और तत्काल इस्तीफे की मांग का संकल्प पत्र पारित किया.

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