नई दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी के लिए लिखित आधार उपलब्ध न कराना अपने आप में जमानत मिलने का स्वचालित (ऑटोमैटिक) अधिकार नहीं बन सकता है। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी (ISI) को संवेदनशील और गोपनीय सैन्य जानकारियां लीक करने के आरोपी झबरा राम को राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा दी गई नियमित जमानत (regular bail) को रद्द कर दिया है। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि अदालत को जमानत देते समय अपराध की गंभीरता, राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव और रिकॉर्ड पर मौजूद पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
पाकिस्तान को सामरिक और सैन्य मूवमेंट की तस्वीरें भेजने का है गंभीर आरोप, ओएसए और बीएनएस के तहत दर्ज हैं संगीन धाराएं
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने पाया कि आरोपी झबरा राम पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA), 1923 की धाराओं के साथ-साथ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत देश की संप्रभुता और सुरक्षा को खतरे में डालने वाले गंभीर आरोप हैं। आरोपी पर पोखरण और जैसलमेर क्षेत्र से जुड़ी सामरिक गतिविधियों, सेना के मूवमेंट की तस्वीरें और वीडियो व्हाट्सएप के जरिए विदेशी आकाओं को पैसे के बदले भेजने का पुख्ता आरोप है। कोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान सामने आए ये तथ्य इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि आरोपी को गिरफ्तारी के समय उसके कारणों की पूरी जानकारी दे दी गई थी और उसे कानूनी सहायता का पूरा अवसर मिला था।
संवैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन का हुआ है पूरा ध्यान, आरोपी को दो हफ्ते के भीतर करना होगा सरेंडर
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) और बीएनएसएस की धारा 47 के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना एक जरूरी संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा है, ताकि आरोपी अपने बचाव की तैयारी कर सके। हालांकि, इस मामले में प्रक्रियात्मक पहलुओं पर अत्यधिक तकनीकी आपत्तियां उठाकर जमानत के मुख्य कानूनी मानदंडों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने रिकॉर्ड की जांच के बाद पाया कि संवैधानिक और कानूनी आवश्यकताओं का पूरी तरह पालन हुआ है। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी झबरा राम को अगले दो सप्ताह के भीतर निचली अदालत या जांच एजेंसी के समक्ष आत्मसमर्पण (सरेंडर) करने का निर्देश दिया है।

