घरेलू अर्थव्यवस्था की गतिविधियों में दूसरी तिमाही में भी विस्तार जारी: वित्त मंत्रालय की मासिक रिपोर्ट

नयी दिल्ली, 29 अक्टूबर (वार्ता) वित्त मंत्रालय की गुरुवार को जारी अक्टूबर, 2026 की ‘मासिक आर्थिक समीक्षा’ रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की अर्थव्यवस्था में चालू वित्त वर्ष के पहली तिमाही (अप्रैल-जून,2026) में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की अनुमान से अधिक मजबूत वृद्धि के बाद दूसरी तिमाही में आर्थिक गतिविधियों में विस्तार जारी रहा। रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में परिस्थितियों की अस्थिरता को देखते हुए नीति नियामकों को घरेलू स्तर पर व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए आगे सतर्कता बनाए रखनी होगी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि चालू वित्त वर्ष में पहली तिमाही की पूर्वानुमान से अधिक 7.8 प्रतिशत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि के बाद, दूसरी तिमाही में भी आर्थिक गतिविधियों का विस्तार जारी रहा। इसे देखते हुए कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने 2026-27 के लिए अपने विकास अनुमानों में वृद्धि की है। अब ये अनुमान मोटे तौर पर सात प्रतिशत के आसपास हैं।

रिपोर्ट में वित्त मंत्रालय के वास्तविक समय के अनुमानों के अनुसार चालू वित्त वर्ष में आर्थिक वृद्धि 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘घरेलू मांग, निवेश गतिविधियों और संरचनात्मक सुधारों से वर्ष के शेष भाग में आर्थिक वृद्धि को समर्थन मिलने की उम्मीद है। हाल ही में किए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संबंधी प्रक्रियागत सुधारों से व्यवसायों के लिए अनुपालन संबंधी बोझ और कार्यशील पूंजी की बाधाएं और कम होंगी। ऋण में स्वस्थ वृद्धि तथा हाल के व्यापार समझौतों से उपभोग, निवेश और निर्यात को अतिरिक्त प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।”

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि निकट भविष्य में औद्योगिक क्षेत्र की संभावनाएं मजबूत उत्पादन, बढ़ते ऑर्डर प्रवाह, विनिर्माण क्षेत्र में बेहतर होते कारोबारी विश्वास और औद्योगिक ऋण में मजबूत वृद्धि से समर्थित बनी हुई हैं। साथ में यह भी कहा गया है कि ईंधन की कीमतों को लेकर अनिश्चितता, आपूर्ति शृंखला पर दबाव और भू-राजनीतिक घटनाक्रम विनिर्माण लागत तथा निवेश संबंधी निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। इसमें सिफारिश की गयी है, ” औद्योगिक क्षेत्र की गति को बनाए रखने के साथ-साथ नीतिगत समर्थन को बड़े पैमाने पर अधिक उत्पादन, घरेलू मूल्य संवर्धन में वृद्धि और निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने में परिवर्तित करना महत्वपूर्ण होगा।”
निकट भविष्य में मुद्रास्फीति की प्रवृत्ति घरेलू खाद्य आपूर्ति प्रबंधन, वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और प्रणालीगत तरलता की स्थितियों के संयुक्त प्रभाव से निर्धारित होगी। रिपोर्ट के अनुसार खाद्य पदार्थों के संदर्भ में, आपूर्ति-पक्ष के हस्तक्षेपों से रसोई में उपयोग होने वाली प्रमुख खाद्य वस्तुओं की कीमतों का दबाव कम होने की उम्मीद है।
यह भी कहा गया है कि खाद्य महंगाई दर के मार्चे पर जोखिम बने हुए हैं।

अल नीनो की तीव्र होती घटना शामिल है, जिससे आगामी रबी बुवाई के मौसम में मिट्टी की नमी प्रभावित होने का खतरा है। इसके अतिरिक्त, त्योहारों के दौरान मांग बढ़ने से भी कीमतों पर दबाव पड़ सकता है। बाहरी मोर्चे पर, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें और पश्चिम एशिया के समुद्री पारगमन मार्गों में माल ढुलाई संबंधी व्यवधान उत्पादन लागत में वृद्धि का जोखिम पैदा कर रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को हालांकि सीधे डॉलर की तरलता उपलब्ध कराने तथा मुद्रा बाजार में सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में किए गए उपाय विनिमय दर में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने और आयातित मुद्रास्फीति के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, “आगे चलकर, मुद्रास्फीति के द्वितीयक प्रभावों को नियंत्रित करने में हाल ही में की गई नीतिगत ब्याज दर वृद्धि की प्रभावशीलता केंद्रीय बैंक द्वारा तरलता के सक्रिय प्रबंधन पर निर्भर करेगी।”
रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत की बाह्य क्षेत्र की स्थिति स्थिर बनी हुई है। वस्तुओं के निर्यात में मजबूत वृद्धि और सेवाओं के व्यापार में लगातार बने अधिशेष ने व्यापार संतुलन को सहारा दिया है। अप्रैल से अगस्त 2026 की अवधि के दौरान बैंकिंग पूंजी सहित मजबूत पूंजी प्रवाह ने चालू खाते के बढ़े हुए घाटे के वित्तपोषण में मदद की। यद्यपि रुपये पर बाहरी दबाव बना हुआ है, फिर भी भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति मानक भंडार पर्याप्तता मानदंडों के अनुसार पर्याप्त है और 10.3 महीनों के आयात के बराबर सुरक्षा उपलब्ध है।
रिपोर्ट में कहा गया है, “समग्र रूप से, ये घटनाक्रम बाह्य क्षेत्र की स्थिरता के लिए एक अनुकूल आधार प्रदान करते हैं, हालाँकि वैश्विक अनिश्चितताएं और कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं।”
वैश्विक परिस्थितियों की अनिश्चितताओं के इस दौर में सतर्कता की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया है, “ऐसी अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों में, जहां आपूर्ति से जुड़ी अनिश्चितताएं बहुत अधिक हैं, लगातार सतर्क रहना ही व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की कीमत है।”

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