इज़रायल चुनाव में नेतन्याहू और आइसेनकोट को बहुमत न मिलने से अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां बनेंगी ‘किंगमेकर’

तेल अवीव, 28 अक्टूबर (वार्ता) इजरायल में बुधवार को आए आंशिक चुनाव परिणामों में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गुट आगे चल रहा है लेकिन वह संसदीय बहुमत से पीछे दिख रहा है। इससे देश का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित हो गया है जबकि विपक्षी दल अपने विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। केंद्रीय चुनाव समिति द्वारा जारी आंशिक नतीजों के अनुसार, लगभग 55 प्रतिशत वोटों की गिनती के बाद, 120 सदस्यों वाली नेसेट (संसद) में नेतन्याहू गुट के पास 56 सीटें हैं। मीडिया के अनुमानों के अनुसार, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 49 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि अरब पार्टियों को 16 सीटें मिल सकती हैं।

अगर विपक्षी नेता सहयोग करने के लिए तैयार हों तो अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां ‘किंगमेकर’ बन सकती हैं। इन दो अरब पार्टियों के पिछले किसी भी चुनाव के मुकाबले ज्यादा सीटें जीतने का अनुमान है। ऐसा अरब नागरिकों के मतदान में भारी उछाल के कारण हो रहा है। ये नागरिक इजरायल की कुल आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा हैं और अक्सर इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिक के रूप में पहचाने जाते हैं।
इजरायल के प्रमुख टेलीविजन नेटवर्कों के एग्जिट पोल से संकेत मिला है कि अधिकतर मतदाताओं ने श्री नेतन्याहू के गठबंधन का विरोध करने वाली पार्टियों का समर्थन किया है, हालांकि उनकी लिकुड पार्टी सबसे बड़ी एकल पार्टी बनी हुई है। न तो नेतन्याहू गुट और न ही विपक्ष के पास सरकार बनाने के लिए जरूरी 61 सीटों तक पहुंचने का कोई स्पष्ट रास्ता नजर आ रहा है।

श्री नेतन्याहू का मौजूदा गठबंधन, जिसमें कट्टर राष्ट्रवादी और कट्टर रुढ़िवादी यहूदी पार्टियां शामिल हैं, पिछली संसद में प्राप्त 68 सीटों के मुकाबले कमजोर होता दिख रहा है। सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने के लिए श्री नेतन्याहू और श्री आइसेनकोट दोनों को ही कठिन समझौते का सामना करना पड़ सकता है।
यह परिणाम ऐसे समय में आया है, जब अरब समुदायों के बीच, अपराध और हिंसा को लेकर कट्टर-दक्षिणपंथी सरकार के कामकाज को लेकर काफी असंतोष है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, श्री नेतन्याहू और विपक्ष के कई नेताओं ने सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों पर निर्भर न रहने का वादा किया है। उनका तर्क है कि अरब पार्टियों की भागीदारी से राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय संघर्षों को लेकर इज़रायल के रुख पर असर पड़ सकता है।

अगर विपक्ष के नेता अपना रुख बदल लेते हैं, तो वे सरकार बना सकते हैं और श्री नेतन्याहू के कार्यकाल को खत्म कर सकते हैं। अरब सांसदों के साथ सहयोग को लेकर लेकिन विपक्ष के भीतर मौजूद मतभेद, सत्ता में आने की श्री आइसेनकोट की कोशिशों को मुश्किल बना सकते हैं। सात अक्टूबर, 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमलों के बाद से इज़रायल में यह पहला चुनाव है। इन हमलों ने सुरक्षा की बड़ी खामियों को उजागर कर दिया था और एक ऐसा क्षेत्रीय संघर्ष छेड़ दिया, जिसकी चपेट में गाज़ा, लेबनान और सीरिया भी आ गए। इज़रायल ने ईरान के साथ भी सीधे टकराव के दो दौर देखे हैं, जबकि श्री नेतन्याहू ने और ज्यादा सैन्य कार्रवाई की वकालत की है। लेबनान और ईरान समेत कई मोर्चों पर लगभग तीन साल तक चले युद्ध के बाद, इस चुनाव प्रचार में सुरक्षा और देश की भविष्य की दिशा सबसे अहम मुद्दे रहे हैं।

इज़रायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे श्री नेतन्याहू ने तर्क दिया कि उनकी सरकार को अपने सैन्य लक्ष्यों को हासिल करने और इज़रायल के विरोधियों पर दबाव बनाए रखने के लिए और समय चाहिए। आने वाले दिनों में जैसे-जैसे वोटों की गिनती होगी, सीटों के अंतिम अनुमान बदल सकते हैं। नतीजों के प्रमाणित होने के बाद, राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से सलाह लेंगे। इसके बाद, वे बहुमत हासिल करने की सबसे अच्छी स्थिति में माने जाने वाले उम्मीदवार को सरकार बनाने के लिए कहेंगे।

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