
झाबुआ. जिले में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक है। जिले के मोरझरिया गांव के उकाला फलिया में करीब 70 परिवार रहते हैं। यहां लगभग 50 बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल की आवश्यकता है, लेकिन गांव में स्कूल नहीं होने के कारण ये बच्चे गाय-भैंस चराने को मजबूर हैं।
पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चों का समय मवेशी चराने और खेती-बाड़ी के कामों में बीत रहा है। गांव के निवासी भेरूलाल के अनुसार, सबसे नजदीकी स्कूल भी गांव से करीब पांच किलोमीटर दूर है। वहां तक पहुंचने के लिए बच्चों को कच्चे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। रास्ते में एक तालाब भी पड़ता है, जिसके कारण अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता सताती है।
इस समस्या को लेकर ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री की सीएम हेल्पलाइन पर शिकायत भी दर्ज कराई थी। हालांकि, ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी उन पर शिकायत वापस लेने का दबाव बना रहे हैं। गांव के बच्चों का कहना है कि वे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन डाइस कोड नहीं मिलने के कारण पिछले कई वर्षों से यहां स्कूल बंद है।
गांव के जनपद सदस्य विरसिंह ने बताया कि करीब दो साल पहले अनुविभागीय अधिकारी की पहल पर यहां स्कूल शुरू किया गया था। हालांकि, डाइस कोड नहीं मिलने के कारण यह व्यवस्था भी बंद हो गई। मोरझरिया गांव झाबुआ जिले की पेटलावद तहसील के अंतर्गत आता है।
वर्ष 2018-19 में गांव का सर्वे किया गया था, जिसमें 54 बच्चे चिह्नित किए गए थे। जनपद शिक्षा केंद्र, पेटलावद की ओर से जिला परियोजना समन्वयक, जिला शिक्षा केंद्र, झाबुआ को पत्र भेजकर उकाला फलिया की प्राथमिक शाला के लिए नया डाइस कोड जारी करने और अतिथि शिक्षक की व्यवस्था करने का प्रस्ताव दिया गया था।
वीईआर सर्वे में दर्ज 54 बच्चों में 24 नए और 30 नवीनीकरण वाले बच्चे शामिल थे। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से स्थायी व्यवस्था नहीं किए जाने के कारण बच्चों को नियमित शिक्षा का लाभ नहीं मिल सका।
ग्रामीणों के अनुसार, करीब दो साल पहले दलसिंह वसुनिया नामक शिक्षक को यहां पदस्थ कर स्कूल चलाने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन यह व्यवस्था भी अधिक समय तक नहीं चल सकी। दो साल के भीतर स्कूल बंद हो गया और शिक्षक को भी हटा दिया गया।
इस मामले में बीआरसी रेखा गिरी का कहना है कि स्कूल क्यों बंद हुआ, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। मामला संज्ञान में आने के बाद गांव में स्कूल भवन बनाने के लिए जमीन चिह्नित कर प्रस्ताव भोपाल भेजा गया है। वहां से स्वीकृति मिलने के बाद स्कूल शुरू किया जा सकेगा।
मोरझरिया गांव के इस फलिये में कोई सरकारी भवन नहीं है। यहां आंगनवाड़ी भी निजी भवन में किराये पर संचालित की जा रही है। यह क्षेत्र प्रदेश की महिला एवं बाल विकास मंत्री और स्थानीय विधायक सुश्री निर्मला भूरिया के विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है।
ऐसे में मंत्री के विधानसभा क्षेत्र के एक गांव में बच्चों को बुनियादी शिक्षा के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब बच्चों के लिए स्कूल जैसी मूलभूत सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत क्या है? अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि प्रशासन जल्द ही स्थायी स्कूल व्यवस्था करेगा, ताकि बच्चों का भविष्य मवेशी चराने तक सीमित न रह जाए।
